Last Updated:
RBI ने क्रेडिट डेरिवेटिव्स बाजार को मजबूत बनाने के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिनसे बैंक, वित्तीय संस्थान और बड़ी कंपनियां क्रेडिट रिस्क का बेहतर मैनेजमेंट कर सकेंगी.नए नियमों के तहत गैर-रिटेल भारतीय निवेशकों को CDS और TRS जैसे साधनों के इस्तेमाल में ज्यादा छूट दी गई है, जबकि नॉन-रेजिडेंशियल निवेशक इन्हें केवल हेजिंग के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे. RBI का मानना है कि इससे कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में लिक्विडिटी बढ़ेगी और कंपनियों के लिए फंड जुटाना आसान होगा.
नए नियम लागू होने के बाद अब कुछ श्रेणी के निवेशकों को क्रेडिट डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल पहले से अधिक आसानी से करने की अनुमति मिलेगी.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने क्रेडिट डेरिवेटिव्स मार्केट को मजबूत बनाने के लिए नए नियम जारी कर दिए हैं. इन नियमों का फोकस भारतीय कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट को अधिक बेहतर करना और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन को क्रेडिट रिस्क (RBI New Rules) का बेहतर मैनेजमेंट करने की सुविधा देना है. सरकार के बजट में इस मार्केट को बढ़ावा देने की घोषणा के बाद RBI ने यह कदम उठाया है.
नए नियम लागू होने के बाद अब कुछ कैटेगरी के निवेशकों को क्रेडिट डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल पहले से अधिक आसानी से करने की अनुमति मिलेगी. इससे कंपनियों के लिए फंड जुटाना आसान हो सकता है और फाइनेंशियल मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ने की उम्मीद है. RBI का मानना है कि इससे भारतीय बॉन्ड बाजार को भी मजबूती मिलेगी.
किन निवेशकों को क्या मिली छूट?
RBI के नए नियमों के तहत भारतीय निवासी गैर-रिटेल यूजर्स, जैसे बैंक, वित्तीय संस्थान और बड़ी कंपनियां, अब क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप (CDS) और टोटल रिटर्न स्वैप (TRS) जैसे क्रेडिट डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल बिना किसी तय फोकस (Purpose Restriction) के कर सकेंगे. इससे उन्हें अपने रिस्क का बेहतर तरीके से मैनेजमेंट करने में मदद मिलेगी.
वहीं, नॉन रेजिडेंशियल निवेशकों को इन साधनों का इस्तेमाल केवल हेजिंग यानी अपने निवेश को संभावित नुकसान से बचाने के लिए ही करने की अनुमति होगी. RBI ने यह भी साफ किया है कि रिटेल निवेशकों के लिए इन प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल पर पहले जैसी लीमिट लागू रहेंगी ताकि छोटे निवेशकों को ज्यादा रिस्क का सामना न करना पड़े.
क्या हैं नए नियम?
RBI ने कहा है कि रिटेल रेजिडेंशियल यूजर्स, व्यक्तिगत निवेशकों को छोड़कर, क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप का इस्तेमाल केवल हेजिंग के उद्देश्य से कर सकेंगे. इसके अलावा, नॉन रेजिडेंशियल निवेशकों के साथ किए गए क्रेडिट डेरिवेटिव डील का पेमेंट भारतीय रुपये या फॉरेन करेंसी, दोनों में किया जा सकेगा.
हालांकि, केंद्रीय बैंक ने लोन पर क्रेडिट डेरिवेटिव्स की अनुमति देने की मांग स्वीकार नहीं की है. RBI का मानना है कि ऐसा करने से बाजार में अनावश्यक रिस्क बढ़ सकता है. इसलिए फिलहाल इस तरह के लेनदेन को मंजूरी नहीं दी गई है. इससे बाजार में ट्रांसपरेंसी और वित्तीय अनुशासन बनाए रखने में मदद मिलेगी.
बाजार और अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि नए नियमों से भारतीय कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार को बड़ा फायदा होगा. कंपनियां अपने क्रेडिट रिस्क को बेहतर तरीके से दूसरे पक्ष को ट्रांसफर कर सकेंगी, जिससे बॉन्ड जारी करना आसान होगा. इसके साथ ही बाजार में लिक्विडिटी बढ़ेगी और निवेशकों को निवेश के नए ऑप्शन मिलेंगे.
बैंक और अन्य फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन भी इन रिसोर्स की मदद से अपनी बैलेंस शीट को अधिक सुरक्षित बना सकेंगे. इससे पूरे फाइनेंशियल फाउंडेशन की मजबूती बढ़ेगी. यह कदम भारतीय क्रेडिट डेरिवेटिव्स बाजार को ग्लोबल स्टैंडर्स के करीब ले जाने में मदद करेगा. साथ ही, कंपनियों के लिए फंड जुटाने की लागत कम हो सकती है और निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा.
About the Author
यशस्वी यादव एक अनुभवी बिजनेस राइटर हैं, जिन्हें मीडिया इंडस्ट्री में दो साल का अनुभव है। ये नेटवर्क18 के साथ मनी सेक्शन में सब-एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं। यशस्वी का फोकस बिजनेस और फाइनेंस से जुड़ी खबरों को रिस…और पढ़ें