नई दिल्ली. जब भी हम प्योर इंडियन कमर्शियल सिनेमा की बात करते हैं, तो एक नाम हमेशा सबसे ऊपर आता है- कॉमेडी के किंग डेविड धवन. समय बदला है, ऑडियंस बदली है, और सिनेमा देखने का तरीका भी, लेकिन बड़े पर्दे के सामने बैठकर बिना किसी स्ट्रेस के हंसने का मजा कभी कम नहीं हुआ. फिल्म ‘है जवानी तो इश्क होना है’ इस जॉनर को एक नए स्वैग और मॉडर्न अंदाज के साथ वापस लाती है. यह फिल्म सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर मुकाबला करने या रिकॉर्ड बनाने के लिए रिलीज नहीं हुई थी. इसका साफ और पक्का मकसद थिएटर जाने वालों को उनके रोजमर्रा के स्ट्रेस से आजाद करके उन्हें दो से ढाई घंटे की बेफिक्र हंसी का तोहफा देना था. आइए इस फिल्म के हर पहलू को गहराई से देखते हैं.
कहानी
इस फिल्म की कहानी एक मजेदार भूलभुलैया की तरह काम करती है, एक ऐसी भूलभुलैया जहां अंदर जाते ही देखने वाला अपनी सारी प्रैक्टिकल चिंताएं पीछे छोड़ देता है. राइटर और डायरेक्टर को इस बात की गहरी समझ है कि कैसे एक आम सी गलतफहमी को स्क्रीन पर एक मजेदार और हंसाने वाले कॉमिक स्टॉर्म में बदला जा सकता है. फिल्म की मेन कहानी गलत पहचान और एकदम सही टाइमिंग वाले सिचुएशनल कॉमिक सीन की कहानी पर बेस्ड है. पहले 15 मिनट में कैरेक्टर्स के बीच जो झूठ, सच और वहम सामने आते हैं, वे आखिर तक अपनी रफ्तार और पकड़ बनाए रखते हैं. कहानी एक ऐसे लड़के के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसके अपने सपने हैं, लेकिन वह खुद को ऐसी सिचुएशन में फंसा हुआ पाता है जहां उसे एक साथ कई मोर्चों पर खुद को साबित करना होता है.
सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इस सारी जोरदार कॉमेडी और तेज-तर्रार मस्ती के बीच, फिल्म की मेन स्पिरिट मजबूत बनी हुई है. कहानी सिर्फ खोखली बातों के बारे में नहीं है, बल्कि, फैमिली वैल्यूज की इंपॉर्टेंस पर जोर दिया गया है. दोस्ती का फर्ज और उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने का जज्बा फिल्म में बुना गया है. नए जमाने के रोमांटिक पलों और आज की जेनरेशन की मुश्किलों को बड़ी नजाकत और ग्रेस के साथ दिखाया गया है. यही वजह है कि यह हल्की-फुल्की कॉमेडी सिर्फ यूथ फिल्म नहीं बनती, बल्कि एक पूरी फैमिली ड्रामा की पहचान बन जाती है. हर सीन अगले सीन में इतनी आसानी से जुड़ जाता है कि दर्शकों को स्क्रीन से नजरें हटाने का एक पल भी नहीं मिलता.
एक्टिंग
एक्टिंग की बात करें तो, यह फिल्म एनर्जी और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से भरपूर है. हर एक्टर ने अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया है. वरुण धवन यहां स्क्रीन पर एक अलग ही लेवल का करिश्मा लाते हैं. जैसे ही वह स्क्रीन पर आते हैं, पूरे थिएटर का एनर्जी लेवल अचानक बढ़ जाता है. उनके शानदार चेहरे के एक्सप्रेशन, बेहतरीन डायलॉग डिलीवरी और सिचुएशन के हिसाब से कॉमिक टाइमिंग साफ दिखाती है कि वह इस जॉनर के सबसे भरोसेमंद एक्टर में से एक क्यों हैं. वह अपने पिता डेविड धवन के क्लासिक हीरो (गोविंदा और सलमान खान) की भावना को जगाते हैं, फिर भी आज के मॉडर्न यूथ का स्वैग भी दिखाते हैं. उन्होंने खुद को एक बहुत मैच्योर और हर तरह से मास एंटरटेनर के तौर पर साबित किया है. फिल्म की दो लीडिंग एक्ट्रेस मृणाल ठाकुर और पूजा हेगड़े सिर्फ ग्लैमर कोशेंट बढ़ाने के लिए नहीं हैं, बल्कि वे कहानी को आगे बढ़ाती हैं.
मृणाल ठाकुर अपने किरदार में एक प्यारी सी सादगी, संतुलन और इमोशनल गहराई लाती हैं. जबकि स्क्रीन पर बहुत सारी कॉमेडी और उथल-पुथल होती है, मृणाल का किरदार फिल्म को एक बहुत जरूरी इमोशनल एज देता है जो सीधे दर्शकों से जुड़ता है. वहीं, पूजा हेगड़े अपने शानदार स्टाइल, अटूट कॉन्फिडेंस और ग्लैमरस प्रेजेंस के साथ, पूजा हर सीन में एक अनोखा स्पार्क और फ्रेशनेस लाती हैं. वरुण के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री सच में एक कमाल का स्पार्क पैदा करती है.
मनीष पॉल ने इस फिल्म में वन-लाइनर्स और पंचलाइन्स की कला में मास्टरी हासिल की है, जिससे उनकी हर एंट्री पर हंसी आती है. वरुण के साथ उनकी केमिस्ट्री फिल्म का सबसे मजबूत प्वाइंट है, जबकि जिमी शेरगिल की सिचुएशनल कॉमेडी, जो उनके सिग्नेचर सीरियस, सख्त और शांत अंदाज में है, शानदार है. उनका सख्त चेहरा इस फिल्म में हंसी का सबसे बड़ा सोर्स है.
सरप्राइज पैकेज: मौनी रॉय की मौजूदगी कहानी में एक दमदार और फ्रेश ट्विस्ट लाती है, जो दर्शकों को हैरान कर देगी. इसके अलावा, चंकी पांडे, अली असगर, राजेश कुमार और राकेश बेदी जैसे अनुभवी एक्टर्स की टीम ने स्क्रीन पर इतना शानदार एंटरटेनमेंट बुना है कि कोई भी सबप्लॉट धीमा नहीं लगता.
डायरेक्शन
इस पूरी फिल्म के ‘कैप्टन ऑफ द शिप’ डेविड धवन हैं. उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भले ही सिनेमा का आज का जमाना बदल गया हो, लेकिन सिचुएशनल कॉमेडी का उनका फॉर्मूला अब भी कायम है. डेविड धवन का डायरेक्शन इस फिल्म को जल्दबाजी में बनाए गए प्रोजेक्ट के बजाय एक पूरा थिएटर एक्सपीरियंस बनाता है. उन्होंने कॉमिक सीन, कैरेक्टर की बातचीत और डांस नंबर को स्क्रीन पर फैलने और जान डालने के लिए काफी समय दिया है. डेविड धवन की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उन्होंने अपने क्लासिक 90 के दशक के मसाले को आज के इंस्टाग्राम और रील्स के जमाने के हिसाब से इतनी खूबसूरती से ढाला है कि यह कभी भी पुराना या आउटडेटेड नहीं लगता.
सिनेमैटोग्राफी
टेक्निकली, अयनका बोस का विजुअल सेंस जबरदस्त है. उन्होंने पूरी फिल्म को रंगों के एक बड़े कार्निवल की तरह शूट किया है. फिल्म का हर फ्रेम रिच, वाइब्रेंट और आंखों को सुकून देने वाला लगता है. आउटडोर लोकेशन से लेकर इनडोर सेट तक, कलर सिलेक्शन इतना ब्राइट है कि यह हर पल फिल्म के खुशनुमा मूड को सपोर्ट करता है. कॉमिक सीन में कैमरा मूवमेंट बहुत जरूरी होते हैं ताकि कैरेक्टर के एक्सप्रेशन न छूटें. अयनाका बोस ने वरुण धवन और मनीष पॉल के क्लोज-अप और उनके बीच की फिजिकल कॉमेडी को बहुत सटीकता से कैप्चर किया है, जो हंसी के असर को दोगुना कर देता है.
म्यूजिक
म्यूजिक फिल्म का एक और अहम हिस्सा है, जो कहानी की रफ्तार बनाए रखता है. तनिष्क बागची और व्हाइट नॉइज कलेक्टिव के कंपोजर्स की पूरी टीम ने एक वाइब्रेंट साउंडट्रैक बनाया है जो दर्शकों को थिएटर तक थिरकने पर मजबूर कर देगा. फिल्म का असली हाइलाइट और थिएटर में जरूर देखने लायक पल, वह है जब अनु मलिक और शंकर महादेवन का मशहूर रीक्रिएटेड टाइटल ट्रैक बजता है. यह पल तुरंत पुराने दर्शकों में पुरानी यादें ताजा कर देता है और नई पीढ़ी को अपनी धुनों पर नाचने पर मजबूर कर देता है. रेमो डिसूजा और बॉस्को-सीजर की कोरियोग्राफी गानों में एक अनोखा स्वैग जोड़ती है, जिसे वरुण धवन अपनी डांसिंग स्किल्स से स्क्रीन पर लाते हैं. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी कॉमिक सिचुएशन को पूरी तरह से बढ़ाता है.
कमियां
फिल्म की कमजोरियों पर बात किए बिना रिव्यू अधूरा है. ‘है जवानी तो इश्क होना है’ एक ब्लॉकबस्टर एंटरटेनमेंट पैकेज है, लेकिन इसमें कुछ कमियां भी हैं. फिल्म का कहानी कहने का तरीका बहुत जाना-पहचाना है. अगर आप मूवी के शौकीन हैं, तो आप पहले से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि अगले सीन में क्या गलतफहमी होगी और उसका अंत कैसे होगा. कहानी में कोई खास लॉजिक या नयापन ढूंढने वाले दर्शक निराश हो सकते हैं. फिल्म का पहला हाफ इतनी तेजी से आगे बढ़ता है कि उस पर ध्यान ही नहीं जाता, लेकिन दूसरे हाफ में, क्लाइमैक्स से ठीक पहले, कुछ सीन थोड़े लंबे लगते हैं. कुछ सबप्लॉट को थोड़ा और छोटा किया जा सकता था. कॉमेडी का लेवल कुछ जगहों पर बहुत ज्यादा लाउड हो जाता है, जो शायद उन दर्शकों को पसंद न आए जो बहुत हल्का या रियलिस्टिक सिनेमा देखना पसंद करते हैं.
अंतिम फैसला
छोटी-मोटी कमियों को छोड़ दें, तो ‘है जवानी तो इश्क होना है’ खुशी, रोमांस, गानों और हंसी का एक परफेक्ट मिक्स है जिसे सिनेमा लवर्स को मिस नहीं करना चाहिए. यह फिल्म इस बात का जीता-जागता सबूत है कि जब सिनेमा बड़े पर्दे पर साफ-सुथरा, शुद्ध मनोरंजन देने के लिए डेडिकेटेड हो तो वह कितना जादुई हो सकता है. कुछ घंटों के लिए दुनिया की चिंताओं और काम के स्ट्रेस को भूल जाइए, अपने माता-पिता, बच्चों और दोस्तों को इकट्ठा कीजिए और इस शानदार, विजुअल और म्यूजिकल ट्रीट का मजा लेने के लिए अपने सबसे पास के थिएटर्स में जाइए. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.