Famous Sweets Of Bihar: शाम ढलते ही छपरा के आम दाढ़ी ढाला चौक पर दूध की भाप और कोयले की हल्की सुगंध मिलकर एक अलग ही किस्म की कहानी रचती है. गांवों से ताजा दूध आता है. कड़ाही में घंटों पकते-पकते वह खोवा बनता है. फिर दुकानदार के अनुभवी हाथों में वही खोवा सुनहरा पेड़ा बनकर चमक उठता है. 50 साल से ज्यादा पुरानी इन दुकानों में न बोर्ड बदलते हैं, न रेसिपी. ₹360 किलो या ₹10 का एक पीस दाम चाहे जो हो, स्वाद वही पुराना, वही भरोसेमंद. सुबह जो 1 क्विंटल से ज्यादा दूध पेड़े में बदलता है. वह शाम होने से पहले ही खत्म हो जाता है. बिहार ही नहीं, उत्तर प्रदेश से भी लोग खास तौर पर यहां आते हैं जैसे किसी पुराने दोस्त से मिलने. कमलदेव प्रसाद जैसे ग्राहक बताते हैं कि 40 साल से इस पेड़े का स्वाद नहीं बदला. इसी मिठास से न सिर्फ पेट भरता है, बल्कि 20-25 परिवारों की रोजी-रोटी भी चलती है. छपरा का यह पेड़ा अब सिर्फ मिठाई नहीं, एक जीती-जागती फूड स्टोरी बन चुका है.