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गाजियाबाद को ‘एक जनपद, एक व्यंजन’ योजना में सोया चाप की पहचान मिलने के बाद शहर में बहस तेज हो गई है. स्थानीय लोग, खाद्य विशेषज्ञ और शिक्षाविद इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि मिल्क केक, जलेबी, इमरती और कचौड़ी जैसे पारंपरिक स्वादों को नजरअंदाज कर सोया चाप को चुनना गाजियाबाद की सांस्कृतिक विरासत के साथ न्याय नहीं है.
प्रतिकात्मक फोटो (AI जेनरेटेड)
गाजियाबाद. उत्तर प्रदेश सरकार की ‘एक जनपद, एक व्यंजन’ योजना का उद्देश्य हर जिले के पारंपरिक और खास व्यंजनों को नई पहचान देना है, ताकि स्थानीय खानपान, संस्कृति और छोटे कारोबार को बढ़ावा मिल सके. लेकिन गाजियाबाद में सोया चाप को जिले की पहचान के रूप में चुने जाने के बाद इस फैसले पर सवाल उठने लगे हैं. शहर के पुराने निवासी, खाद्य विशेषज्ञ और समाजशास्त्री इसे गाजियाबाद की असली खाद्य संस्कृति से अलग बता रहे हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि सोया चाप पिछले कुछ वर्षों में जरूर लोकप्रिय हुआ है, लेकिन इसका गाजियाबाद की पारंपरिक पहचान से कोई खास संबंध नहीं रहा. लोगों के मुताबिक किसी भी जिले के लिए उसी व्यंजन का चयन होना चाहिए, जो वहां की संस्कृति, इतिहास और स्थानीय स्वाद से जुड़ा हो. उनका मानना है कि गाजियाबाद की पहचान वर्षों से मिल्क केक, कलाकंद, जलेबी, इमरती, छोले-भटूरे, लस्सी और कचौड़ी जैसे व्यंजनों से रही है.
पारंपरिक व्यंजनों को नजरअंदाज करने की बात
शहर के पुराने बाशिंदों का कहना है कि गाजियाबाद की मिठाइयों और पारंपरिक खानपान की अलग पहचान रही है. यहां का मिल्क केक, इमरती और जलेबी आसपास के जिलों तक मशहूर हैं. ऐसे में इन व्यंजनों को छोड़कर सोया चाप को प्राथमिकता देना लोगों की समझ से परे है. उनका कहना है कि सरकार को जिले की ऐतिहासिक खानपान विरासत को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए था.
खाद्य विशेषज्ञों ने भी उठाए सवाल
खाद्य मामलों के जानकार और पद्मश्री सम्मानित पुष्पेश पंत ने भी इस चयन पर असंतोष जताया है, उन्होंने कहा कि ‘एक जनपद, एक व्यंजन’ जैसी योजना बनाते समय संबंधित जिले के खानपान के इतिहास और सामाजिक पृष्ठभूमि का गंभीर अध्ययन जरूरी था. उनके अनुसार अगर गाजियाबाद के लिए शिकंजी जैसे पारंपरिक पेय या किसी पुराने स्थानीय व्यंजन को चुना जाता, तो यह ज्यादा उचित होता. पुष्पेश पंत ने बताया कि सोया चाप का विकास 1960 से 1980 के दशक के बीच पंजाब और दिल्ली के कुछ हिस्सों में हुआ था, इसलिए इसे गाजियाबाद की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का हिस्सा मानना सही नहीं कहा जा सकता.
क्या है लोगों की मांग?
स्थानीय नागरिकों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि गाजियाबाद की असली पहचान उसकी लस्सी, समोसे, पूरी-कचौड़ी और मिल्क केक जैसे व्यंजन हैं. उनका मानना है कि सरकार को जिले की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक स्वाद को प्राथमिकता देते हुए फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए. अब यह मुद्दा शहर में चर्चा का विषय बन चुका है और लोग उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी आवाज सरकार तक पहुंचेगी.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें