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पूर्वी राजस्थान का ये देसी पकवान है खास, हर धार्मिक आयोजन में बनती है दावत

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Eastern Rajasthan Famous Food: पूर्वी राजस्थान में पुआ और काशीफल की सब्जी को सिर्फ एक पकवान नहीं, बल्कि धार्मिक आयोजनों की खास पहचान माना जाता है. भंडारा चाहे छोटा हो या बड़ा, इस देसी प्रसादी का इंतजार लोगों को हमेशा रहता है और लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं.

पूर्वी राजस्थान की अपनी एक अलग खान-पान की पहचान है. यहां के कई पारंपरिक व्यंजन आज भी लोगों की जुबान पर अपना स्वाद बनाए हुए हैं. इन्हीं में शामिल है पुआ और काशीफल की सब्जी. खास बात यह है कि यह सिर्फ घरों में बनने वाला पारंपरिक पकवान नहीं, बल्कि करौली और आसपास के क्षेत्र में धार्मिक आयोजनों की पहचान बन चुका है. कोई बड़ा धार्मिक कार्यक्रम हो, भंडारा हो या सामाजिक आयोजन, यहां पुआ और काशीफल की सब्जी की प्रसादी जरूर नजर आती है.

इस प्रसादी का स्वाद ऐसा है कि स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले श्रद्धालु भी इसे बड़े चाव से खाते हैं. यही वजह है कि बड़े आयोजनों में इसे सामान्य मात्रा में नहीं, बल्कि कुंटलों आटे से तैयार किया जाता है भंडारे में पहुंचने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए हलवाई एक दिन पहले से ही इसकी तैयारी में जुट जाते हैं.

करौली की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान ब्रज क्षेत्र से भी जुड़ी हुई है. यहां भगवान राधा मदन मोहन जी सहित कई कृष्ण मंदिरों में पुआ और सब्जी का भोग लगाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. मंदिरों से लेकर बड़े धार्मिक आयोजनों तक इस पकवान की अपनी खास जगह है.

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यही कारण है कि पुआ और काशीफल की सब्जी अब केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि यहां की धार्मिक परंपरा और सामूहिक भोज का हिस्सा बन चुकी है. किसी बड़े आयोजन में जब देसी घी में तैयार पुए और मसालेदार काशीफल की सब्जी की खुशबू फैलती है तो लोगों की भीड़ खुद-ब-खुद प्रसादी की ओर खिंची चली आती है.

धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की संख्या अधिक होने के कारण पुआ और सब्जी भी बड़ी मात्रा में तैयार की जाती है. बड़े भंडारों में सैकड़ों हलवाई एक साथ भट्ठियों पर काम करते नजर आते हैं. कई जगह तो आयोजन से एक दिन पहले ही रसोई की तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं. पुए बनाने के लिए बड़ी मात्रा में आटा तैयार किया जाता है और फिर कड़ाहियों में देसी घी या तेल में पुए तले जाते हैं. दूसरी ओर काशीफल की सब्जी भी बड़े-बड़े बर्तनों में तैयार होती है.

पुआ और काशीफल की सब्जी की खासियत इसका देसी स्वाद है. यही वजह है कि इसे खाने वालों में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक शामिल होते हैं. स्थानीय लोग तो इसे बचपन से ही खाते आ रहे हैं, जबकि बाहर से आने वाले श्रद्धालु भी इसका स्वाद लेने के बाद इसकी तारीफ किए बिना नहीं रहते. खास बात यह है कि इस व्यंजन का स्वाद किसी होटल या रेस्टोरेंट से ज्यादा धार्मिक आयोजनों की सामूहिक रसोई में देखने को मिलता है.

आज के दौर में जहां खान-पान तेजी से बदल रहा है और पारंपरिक व्यंजनों की जगह नए पकवान लेते जा रहे हैं, वहीं करौली में पुआ और काशीफल की सब्जी की परंपरा अब भी मजबूती से कायम है. धार्मिक आयोजनों में इसकी मौजूदगी बताती है कि कुछ स्वाद सिर्फ खाने तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे किसी क्षेत्र की संस्कृति, आस्था और परंपरा का हिस्सा बन जाते हैं.

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