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Awaadh Mehman Nawazi: ग्रामीण महिला निर्मला देवी लोकल 18 से बताती है कि पहले गांवों और छोटे कस्बों में मेहमानों का स्वागत केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कार का प्रतीक माना जाता था. जब भी कोई मेहमान घर आता था तो सबसे पहले उसे गुड़ और लाई दी जाती थी. निर्मला के अनुसार, यह सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और सादगी का प्रतीक थी. गुड़ को मिठास और अपनापन का प्रतीक माना जाता था. इस परंपरा से गांव वालों के बीच अपनापन और मेल-जोल का विशेष भाव पैदा होता था.
आज के समय में लोगों के पास ढेरों सुविधाएं हैं. घर आने वाले मेहमानों के स्वागत के लिए तरह-तरह की मिठाइयां, बिस्कुट और अन्य व्यंजन परोसे जाते है. लेकिन अवध और सुल्तानपुर की ग्रामीण संस्कृति में पहले ऐसा नहीं था. उस दौर में मेहमानों का स्वागत गुड़ और लाई से किया जाता था. मूंज से बनी एक छोटी टोकरी होती थी, जिसमें गुड़ और लाई रखकर मेहमानों को दिया जाता था और साथ में पानी भी परोसा जाता था. अब यह परंपरा धीरे-धीरे लगभग खत्म हो चुकी है और बहुत कम घरों में इस तरह मेहमानों का स्वागत होता है, हालांकि सुल्तानपुर के कुछ गांवों में आज भी गुड़ और लाई के साथ पानी पिलाने की परंपरा जीवित है.
ग्रामीण महिला निर्मला देवी लोकल 18 से बताती है कि पहले गांवों और छोटे कस्बों में मेहमानों का स्वागत केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कार का प्रतीक माना जाता था. जब भी कोई मेहमान घर आता था तो सबसे पहले उसे गुड़ और लाई दी जाती थी. निर्मला के अनुसार, यह सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और सादगी का प्रतीक थी. गुड़ को मिठास और अपनापन का प्रतीक माना जाता था. इस परंपरा से गांव वालों के बीच अपनापन और मेल-जोल का विशेष भाव पैदा होता था.
यह बर्तन देता था देसी रूप
जब मेहमान घर आते थे, तो गर्मी के मौसम में उन्हें लाई और गुड़ के साथ नींबू का शरबत भी दिया जाता था. लाई-गुड़ सिर्फ मेहमानों के लिए ही नहीं, बल्कि जब गांव में बारात आती थी. तब बारातियों को भी लाई, गुड़, अचार, प्याज और हरी मिर्च की चटनी परोसी जाती थी. बारात अक्सर 3 दिन तक रुकती थी और इन दिनों में भी लाई-गुड़ का ही प्रबंध रहता था. इसे मूंज से बनी टोकरीनुमा बर्तन में रखा जाता था, जो मेहमाननवाजी में देसी अंदाज और अपनापन दोनों को दिखाता था.
बदलते समय में परंपरा का महत्व
आज समय बदल चुका है. अब मेहमानों के स्वागत में विभिन्न प्रकार की मिठाइयों और व्यंजनों ने जगह ले ली है. लेकिन गुड़ और लाई की परंपरा कई गांवों में अभी भी ज़िंदा है. यह परंपरा हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और याद दिलाती है कि सादगी में भी सम्मान और प्रेम छिपा होता है. अगर इस परंपरा को फिर से अपनाया जाए तो न सिर्फ हमारी संस्कृति मजबूत होगी, बल्कि हम अपने बच्चों को भी भारतीय मूल्यों और ग्रामीण संस्कारों से जोड़ सकेंगे.
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काशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. अभी लोकल18 यूपी के कॉर्डिनेटर की…और पढ़ें