दक्षिण भारत की पारंपरिक थाली में अगर किसी मीठे व्यंजन की खास जगह है, तो वह पायसम है. चावल, दूध, गुड़ या चीनी और इलायची से बनने वाली यह मिठाई देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसके पीछे दक्षिण भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और उत्सवों से जुड़ी लंबी कहानी है. केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में अलग-अलग तरीके से तैयार किया जाने वाला पायसम आज भी शादियों, त्योहारों और खास अवसरों का अभिन्न हिस्सा है.

पायसम शब्द की जड़ संस्कृत के ‘पयस्’ शब्द से मानी जाती है, जिसका अर्थ दूध होता है. दूध से तैयार होने वाली मीठी खीर जैसे व्यंजनों के लिए समय के साथ यह नाम इस्तेमाल होने लगा. दक्षिण भारत में इसे अलग-अलग स्थानीय नामों और तरीकों से बनाया जाता है. कहीं इसे पायसम कहा जाता है, तो कहीं इसकी खास किस्मों के अलग नाम हैं.

मंदिरों से भी जुड़ी है परंपरा

पायसम का धार्मिक महत्व भी काफी पुराना है. दक्षिण भारत के कई मंदिरों में इसे प्रसाद के रूप में तैयार किया जाता है. केरल के मंदिरों में मिलने वाला पाल पायसम और अन्य प्रकार के पायसम भक्तों के बीच काफी प्रसिद्ध हैं. मंदिरों में इसे बड़े पैमाने पर तैयार कर श्रद्धालुओं को प्रसाद के तौर पर दिया जाता है. यही वजह है कि पायसम सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा भी बन गया.

शादियों में क्यों बनता है पायसम?

दक्षिण भारतीय शादियों में भोजन को लेकर कई पारंपरिक नियम और रीति-रिवाज हैं. केले के पत्ते पर परोसे जाने वाले पारंपरिक भोजन के अंत में पायसम परोसा जाना आम बात है. मीठे से भोजन का समापन शुभ माना जाता है और मेहमानों को मिठास परोसना खुशी और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. इसी कारण शादी जैसे शुभ अवसरों पर पायसम को खास जगह मिलती है.

हर राज्य में अलग स्वाद

पायसम की खूबसूरती यह है कि इसका स्वाद जगह के साथ बदल जाता है. केरल में अड प्रदमन काफी लोकप्रिय है, जिसमें चावल से बने अड, गुड़, नारियल के दूध और घी का इस्तेमाल किया जाता है. वहीं पाल पायसम दूध और चावल से तैयार किया जाता है. कर्नाटक में शाविगे पायसा यानी सेवई से बना पायसम लोकप्रिय है, जबकि कुछ जगहों पर मूंग दाल, चना दाल या साबूदाने से भी इसे तैयार किया जाता है.

त्योहारों में भी खास महत्व

ओणम जैसे प्रमुख त्योहारों में पायसम का विशेष स्थान है. केरल की पारंपरिक ओणम सद्या में कई तरह के पायसम परोसे जा सकते हैं. त्योहारों के दौरान परिवार साथ बैठकर इसे बनाते और खाते हैं, जिससे यह केवल खाने की चीज न रहकर सामूहिक उत्सव का हिस्सा बन जाता है.

सिर्फ मिठाई नहीं, संस्कृति की पहचान

पायसम की खासियत इसके स्वाद से कहीं आगे जाती है. दूध, गुड़, चावल, दाल, नारियल और सूखे मेवों जैसी स्थानीय सामग्री से बनने वाला यह व्यंजन दक्षिण भारत की खाद्य परंपरा को दर्शाता है. पीढ़ियों से चली आ रही इसकी रेसिपी आज भी घरों और मंदिरों में कायम है. यही कारण है कि दक्षिण भारत में पायसम को सिर्फ एक मीठी डिश नहीं, बल्कि शुभ अवसर, आस्था, मेहमाननवाजी और पारिवारिक परंपरा की मिठास के रूप में देखा जाता है.



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