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Mithila potato chips: मिथिला की धरती सिर्फ मखाना और पाग के लिए ही नहीं जानी जाती. यहां की रसोई में एक ऐसा देसी स्वाद छिपा है जो पीढ़ियों से घर-घर की पहचान बना हुआ है. यह है आलू के चिप्स, लेकिन बाजार वाले पैकेट नहीं, बल्कि मिथिला के घरों में हाथ से बने, धूप में सूखे और प्यार से तैयार किए गए असली चिप्स. इनका न केवल स्वाद खास होता है बल्कि ये बिना किसी केमकिल और प्रिजर्वेटिव के तैयार होते हैं. इन्हें सालों-साल स्टोर किया जा सकता है.
जब बाजार में चिप्स का चलन नहीं था, तब से ही मिथिला के घरों में यह परंपरा चली आ रही है. आलू की फसल आने पर घर की महिलाएं बड़े आलू चुनकर उन्हें पतले-पतले स्लाइस में काटती हैं. यह काम दादी-नानी से सीखी हुई कला का हिस्सा होता है. कटे हुए स्लाइस को नमक वाले पानी में डालकर रखा जाता है, जिससे बाद में ये और ज्यादा कुरकुरे बनते हैं.
इसके बाद शुरू होता है धूप में सुखाने का काम. इन स्लाइस को बांस की बड़ी टोकरियों में फैलाकर छत पर रखा जाता है. मिथिला की तेज धूप में ये 3 से 4 दिनों में सफेद-सुनहरे सूखे चिप्स में बदल जाते हैं. बिना किसी प्रिजर्वेटिव के ये चिप्स लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं और जरूरत पड़ने पर कभी भी तलकर इस्तेमाल किए जा सकते हैं.
दरभंगा की राजकुमारी देवी बताती हैं कि यह सिर्फ खाना नहीं बल्कि परंपरा है. शादी-ब्याह हो या तीज-त्योहार, घर में मेहमान आएं तो तुरंत गरमा-गरम चिप्स और चाय का स्वागत किया जाता है. उनके अनुसार घर में साल भर चिप्स का स्टॉक रखा जाता है ताकि कभी कमी न पड़े.
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सबसे खास बात यह है कि यह सिर्फ एक स्नैक नहीं बल्कि मिथिला की मेहमाननवाजी की पहचान है. रिश्तेदारों को उपहार में भी घर के बने चिप्स दिए जाते हैं. हर घर की महिलाओं का मानना है कि बाजार का सामान तो कोई भी ला सकता है, लेकिन घर के बने चिप्स में अपनापन और प्यार होता है.
इन्हें बनाना भी बहुत आसान है. सूखे चिप्स को बस गर्म तेल में डालते ही ये कुछ ही सेकंड में कुरकुरे और सुनहरे हो जाते हैं. ऊपर से काला नमक और लाल मिर्च डालते ही इसका स्वाद और बढ़ जाता है. न किसी तरह की मिलावट, न केमिकल, सिर्फ शुद्ध आलू और घर का प्यार.
यही मिथिला की असली पहचान है, जहां परंपरा, स्वाद और अपनापन एक साथ मिलते हैं. बाजार के चिप्स आते-जाते रहते हैं, लेकिन घर के बने इन चिप्स का स्वाद आज भी उतना ही खास है.