अब तो हमारे जीवन में ब्रेड और बिस्कुट जिस तरह शामिल हैं, उससे लगता ही नहीं कि कभी इन दोनों चीजों का भारत में बहुत विरोध हुआ था. खासकर हिंदुओं के द्वारा. इन्हें छू भर लेने से बहुत हायतौबा मचता था. अगर किसी ने खा लिया तो हाहाकार. ये म्लेच्छों का धर्मभ्रष्ट करने वाला खाना था. लेकिन उसके बाद कैसे 200 से 250 सालों में बिस्कुट और ब्रेड ने पुख्ता तरीके से भारतीयों के जीवन में जगह बना ली. उसकी भी रोचक कहानी है.
अब सुबह नाश्ते में चाय के साथ ब्रेड और बिस्कुट. सैंडविच. स्वादिष्ट ब्रेड आमलेट. शाम की चाय के साथ बिस्कुट. मेहमान आएं तो चाय बिस्कुट. बच्चों से लेकर बड़ों तक हर किसी को अच्छे लगते हैं बिस्कुट. वैसे तो भारत में इसे सबसे पहले गोवा आए पुर्तगाली लेकर आए लेकिन बड़े पैमाने पर ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ अंग्रेज.
ब्रेड और बिस्कुट को भारत के जीवन में अनिवार्य तौर पर शामिल होने की कहानी केवल खाने की आदत बदलने की नहीं है, बल्कि भारत में औपनिवेशिक सत्ता, धर्म, सामाजिक छुआछूत और आधुनिकता के टकराव की भी कहानी है. ब्रेड और बिस्कुट आज जितने आम हैं, 18 और 19वीं सदी में उतने ही “संदिग्ध” माने जाते थे.
गोवा में पुर्तगालियों ने 16वीं सदी में “पाव”‑जैसी ब्रेड शुरू की – स्थानीय या छोटे स्तर पर. असली बदलाव ब्रिटिश राज में हुआ, जब मुंबई, कलकत्ता, मद्रास जैसे बड़े शहरों में अंग्रेज़ों ने नरम, लीवन्ड ब्रेड‑लोफ़ की फैक्टरी‑स्टाइल बेकरी लगाईं. बेकरी कल्चर ने इस तरह भारत में दस्तक दी.
तब बेकरी अंग्रेज अफसरों से लेकर सैनिकों के लिए बेकरी लोफ ब्रेड और लंबे समय तक टिकने वाले हार्ड बिस्किट बनाती थीं. भरूच और सूरत में अंग्रेज़ों ने पहली बेकरी खोलीं, वहां अंडे और ताड़ी के इस्तेमाल की वजह से ऊंची‑जाति हिंदू काम नहीं करते थे.
Hindu Biscuit Co. Ltd. की स्थापना 1890 के दशक में दिल्ली में की गई. ताकि वहां तैनात ब्रिटिश सैनिकों और रूढ़िवादी हिंदू आबादी के लिए बिस्कुट की मांग को पूरा किया जा सके. ये बिस्कुट केवल उच्च जाति के हिंदुओं द्वारा ही बनाए जाते थे. courtesy – Hemant X handle.
शुरू में इसे म्लेच्छ खाना माना गया
भारतीयों ने शुरू में इनका विरोध किया. इसके गहरे धार्मिक और सामाजिक कारण थे. वो इसे म्लेच्छ का खाना मानते थे. इन्हें “अंग्रेजों का खाना” माना जाता था. अंग्रेजों को कई हिंदू समाजों में “म्लेच्छ” कहा जाता था यानी अशुद्ध. उनके हाथ का बना खाना खाने से “जाति भ्रष्ट” हो सकती थी. खासकर उच्च जातियों में इसका कड़ा विरोध था.
19वीं सदी और काफी हद तक 20वीं सदी के मध्य तक भारतीयों की रसोई बहुत पारंपरिक थी. अपने घर में पका खाना खाते थे. बहुत जरूरी होता था कि खाना बना कौन रहा है. ब्रेड बाहर से बनकर आती थी. उसमें पड़ने वाले खमीर को संदिग्ध माना जाता था. इसलिए लोग कहते थे कि ये खाना अपवित्र है, इसे छूना भी नहीं चाहिए.
1857 के विद्रोह के दौरान ये अफवाह फैली कि अंग्रेज भारतीयों को “धर्म भ्रष्ट” करने के लिए खाने-पीने में हस्तक्षेप कर रहे हैं. कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी की बात से अविश्वास जो बढ़ा तो वो खाने-पीने की चीजों पर जा पहुंचा. इस माहौल में ब्रेड-बिस्कुट और संदिग्ध बन गए.
दिल्ली में लगभग 1911 में बना ‘हार्ड टैक’ राशन बिस्किट, जिसमें खासतौर पर ये लिखा है कि ये हिंदू बिस्कुट है. (courtesy – Dr Jennifer Howes X handle)
बंगाली स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और शिक्षाविद बिपिन चंद्र पाल ने अपने संस्मरण ‘ सत्तर बत्सर’ में पूर्वी बंगाल के कच्छर जिले में बिस्कुट को लेकर हिंदुओं में मचे बवाल का वर्णन किया है. पाल ने लिखा, “जब नए अंग्रेजी-शिक्षित मध्यम वर्ग ने अपने ड्राइंग रूम में चाय के साथ बिस्कुट खाए, तो यह खबर कच्छर से सिलहट तक फैल गई. कठोर प्रायश्चित के बाद ही विद्रोही खुद को बहिष्कृत होने से बचा सके.”
रोचक बात ये भी है कि इसे जितना वर्जित माना गया, उतना ही ये आकर्षित करता गया. जयिता शर्मा ऑक्सफोर्ड हैंडबुक ऑफ फूड हिस्ट्री में अपने निबंध ‘फूड एंड एम्पायर’ में लिखती हैं कि धार्मिक नियमों से बचने के लिए, उच्च जाति के हिंदू स्कूली बच्चे अपने मुस्लिम सहपाठियों को इन “अवैध स्वादों” को लाने के लिए मना लेते थे.
फिर बदलाव कैसे आया
ये बदलाव धीरे-धीरे कई रास्तों से आया. कलकत्ता, बंबई, मद्रास में पढ़े-लिखे भारतीयों ने इसे अपनाना शुरू किया. अंग्रेजी शिक्षा और नौकरी करने वाले लोग ब्रेड खाने लगे. पारसी और भारतीय ईसाई समुदाय ने भी बेकरी चलानी शुरू की. इससे विश्वास बढ़ने लगा कि इसे भारतीयों द्वारा बनाया जा रहा है तो खाया जा सकता है.
हंटली एंड पामर्स का एक विज्ञापन. (साभार: विकिमीडिया कॉमन्स)
बाद में कुछ बिस्किट कंपनियों ने अपने बनाए बिस्कुट और ब्रेड की ब्रांडिंग “हिंदू बिस्कुट” के तौर पर की. ये दावा किया कि इसे उनके ब्राह्मण और ऊंची जाति के कर्मचारियों के जरिए बनाया गया है. इसका असर पड़ा.
देश में कई हिंदू बेकरियां खुलने लगीं. उनके बिस्कुट पर लिखा होता था – हिंदू बिस्कुट. स्वदेशी आंदोलन यानि 1905 के बाद जब भारतीय उत्पादों को बढ़ावा मिला तो भारतीयों ने काफी संख्या में अपनी बेकरियां खोलीं. भारतीय ब्रेड और बिस्कुट बनने लगे. विदेशी बिस्कुट की जगह देशी बिस्कुट आने लगे.
तब बेकरी कल्चर मजबूत हो गया
20वीं सदी में बेकरी‑कल्चर मज़बूत हुआ. सस्ते में ब्रेड, बन और बिस्कुट दुकानों पर मिलने लगे. दुकानदार “ब्रेड‑मक्खन” को तेज़, सस्ता और आधुनिक नाश्ता बताकर बेचने लगे. ट्रेन‑स्टेशन, बस‑स्टैंड और बाज़ार के किनारे ब्रेड‑मक्खन वाले स्टॉल्स ने इसे आम लोगों तक पहुंचाया.
वैसे बिस्कुट ने ब्रेड से तेज़ी से जगह बनाई. चाय के साथ खाने में ये आसान थे. जल्दी खराब नहीं होते थे. यात्रा में तो खूब काम आते थे. जब रेल यात्रा बढ़ी, तो लोग ब्रेड और बिस्कुट साथ ले जाने लगे. ऑफिस कल्चर ने इसे और बढ़ाया.
पारले जी बिस्कुट का एक विज्ञापन, 1947. (साभार: द बॉम्बे क्रॉनिकल/विकिमीडिया कॉमन्स)
धीरे धीरे अंग्रेजों का खाना सामान्य भारतीय नाश्ता बन गया. अब ब्रेड आमतौर पर रोज ब्रेकफास्ट में ज्यादातर घरों में इस्तेमाल होती है. ब्रेड और बिस्कुट आम भारतीय घरों में रोटी‑दाल जितने ही आम हो चुके हैं.
ब्रिटानिया वाले गुप्ता बंधु
अंग्रेजों के समय जो भारतीय और हिंदू‑परिवार ब्रेड–बिस्किट की बड़ी बेकरियां और ब्रांड बनाने में सबसे आगे रहे, उनमें गुप्ता परिवार (ब्रिटानिया), दिल्ली बिस्कुट कंपनी वाले और कुछ छोटे‑बड़े स्थानीय बेकर्स थे. उन्होंने हिंदू ब्रेड और हिंदू बिस्कुट की तस्वीरें बनाकर ब्रिटिश‑स्टाइल बेकरी‑कल्चर को भारतीय घरों में पहुंचाया.
ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज़ की शुरुआत 1892 में कलकत्ता में हुई. शुरू में यह एक छोटी बिस्कुट‑फैक्ट्री थी, जिसे बाद में गुप्ता बंधु नलिन चंद्र गुप्ता और अन्य ने खरीदा और बड़ी कंपनी बनाया.
दिल्ली में भी उसी के आसपास एक हिंदू बिस्कुट फैक्ट्री खोली गई. जिसका नाम बाद में “दिल्ली बिस्कुट कंपनी” हो गया. इसने अपने ब्रांड को “हिंदू बिस्किट” के रूप में प्रचलित किया. हालांकि बाद में इस ब्रांड और बिस्कुट फैक्ट्री का ब्रिटानिया में विलय हो गया.
40 तरह के ब्रेड बनाने वाली फैक्ट्री
1883 में थ्रिस्सूर के मम्बली बापू ने “रॉयल बिस्किट फैक्ट्री” खोली, जो भारत की पहली बड़ी बिस्कुट‑फैक्ट्री मानी जाती है. ये यह बेकरी 40 तरह के ब्रेड, बन और बिस्किट बनाती थी. ये “बापूट्टी” के नाम से काफी मशहूर हुई.
सबसे पुरानी भारतीय बेकरी
सबसे पुरानी भारतीय बेकरी सूरत में डोटीवाला बेकर्स एंड कन्फेक्शनर्स के नाम से खोली गई. इसे पारसी फरमजी पेस्टनजी डोटीवाला ने 1700 के आस‑पास शुरू किया. इसे भारत की सबसे पुरानी बेकरियों में एक माना जाता है.
पारले कब आया
पारले भारत में 1929 में आई. यह ब्रिटिश राज के आखिरी दशकों में शुरू हुई. 1929 में गुजरात के मोहनलाल दयाल चौहान ने मुंबई के विले पार्ले इलाके में “हाउस ऑफ पारले नाम की एक छोटी कंपनी शुरू की. शुरू में यहां मुख्य रूप से टॉफी और कैंडी बनती थीं. 1938–1939 के आसपास इस कंपनी ने अपना पहला बिस्किट पार्ले‑ग्लूको (पार्ले‑जी) लांच किया, जो बाद में भारत का सबसे बड़ा बिस्किट ब्रांड बना.