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Rampur Special Halwa Recipe: आपने कई हलवाओं के बारे में सुना होगा… लेकिन कभी हब्शी हलवा का नाम सुना है? नहीं ना तो आज हम आपको रामपुर का ये खास हलवा से रु-ब-रू कराने जा रहे हैं. इस नवाबी मिठाई को सरकार ने एक जनपद एक व्यंजन योजना में शामिल कर लिया है. आइए जानते हैं कैसे बनता है और कहां मिलता है.
रामपुर: रामपुर की पहचान अब सिर्फ कबाब और कोरमा तक सीमित नहीं रही बल्कि यहां की एक खास मिठाई हब्शी हलवा अब देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बनाने जा रही है. करीब 100 साल पुरानी इस नवाबी मिठाई को सरकार ने एक जनपद एक व्यंजन योजना में शामिल कर लिया है. जैसे ही यह फैसला आया रामपुर के कारीगरों और दुकानदारों में खुशी की लहर दौड़ गई क्योंकि अब इस पारंपरिक मिठाई को बड़ा प्लेटफॉर्म मिलने वाला है.
ये है सबसे खास बात
हब्शी हलवा की खास बात यह है कि यह सिर्फ रामपुर में ही बनाया जाता है. यही वजह रही कि इसे इस योजना के लिए चुना गया. पहले रामपुरी कोरमा का नाम सामने आया था, लेकिन कोरमा तो देश के कई हिस्सों में बनता है. जबकि हब्शी हलवा एक ऐसी विरासत है जो केवल रामपुर से जुड़ी है. कारीगर रजा अली खान जो कई सालों से इस हलवे को बना रहे हैं और हकीम जी पुरानी नवाबी दौर की दुकानों पर बेचते भी हैं… इस फैसले से काफी खुश हैं.
उनका कहना है कि सरकार का यह कदम उनके कारोबार के लिए बहुत बड़ा मौका लेकर आया है. वे बताते हैं कि अब हमारे हलवे की पहचान और दूर तक पहुंचेगी. पहले ही मुंबई, दुबई, कुवैत, सऊदी अरब, अमेरिका और इंग्लैंड तक ऑर्डर जाते हैं, लेकिन अब डिमांड और बढ़ने की उम्मीद है.
कैसे बनता है ये हलवा?
रजा अली खान बताते हैं कि हब्शी हलवा बनाना कोई आसान काम नहीं है. इसे तैयार करने में घंटों की मेहनत लगती है. दूध को लगातार कड़ाही में पकाया जाता है. फिर उसमें अंकुरित गेहूं, देसी घी, चीनी और खास जड़ी-बूटियां मिलाई जाती हैं. इस पूरी प्रक्रिया में 3 से 4 घंटे का समय लगता है. एक बार में करीब 15 किलो हलवा तैयार होता है. यही मेहनत और खास रेसिपी इसे बाकी हलवों से अलग बनाती है.
कितना किलो रुपया मिलता है?
कीमत की बात करें तो फिलहाल यह हलवा करीब 400 रुपये किलो बिक रहा है, लेकिन इसकी डिमांड इतनी ज्यादा है कि कई बार दुकानदारों को ऑर्डर पूरे करना मुश्किल हो जाता है. रजा अली बताते हैं कि उनकी रामपुर में आठ दुकानें हैं और एक दुकान से ही रोजाना 25 से 30 किलो हलवा आसानी से बिक जाता है. कई दिनों में यह आंकड़ा 50 किलो तक पहुंच जाता है जबकि सीजन या त्योहारों में मांग इतनी बढ़ जाती है कि सप्लाई कम पड़ जाती है. सर्दियों में इस हलवे की डिमांड सबसे ज्यादा होती है. इसकी वजह इसकी तासीर है, जो शरीर को गर्माहट देती है. कारीगरों के मुताबिक, इसमें डाली जाने वाली जड़ी-बूटियां और मेवे इसे सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद बनाते हैं खासकर हड्डियों के लिए.
कब हुई थी शुरुआत?
इतिहास की बात करें तो हब्शी हलवे की शुरुआत नवाबों के दौर में करीब 1930 के आसपास हुई थी. उस समय इसे शाही रसोई में तैयार किया जाता था और खास मौकों पर परोसा जाता था. धीरे-धीरे यह आम लोगों तक पहुंचा, लेकिन इसकी रेसिपी और बनाने का तरीका आज भी वैसा ही है जैसा पहले हुआ करता था. वहीं, सरकार की एक जनपद एक व्यंजन योजना का मकसद हर जिले की खास पहचान को आगे लाना है ताकि स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके हब्शी हलवे को इस योजना में शामिल किए जाने से अब न सिर्फ रामपुर की पहचान मजबूत होगी बल्कि यहां के कारीगरों की आमदनी भी बढ़ेगी
About the Author
Kavya Mishra is working with News18 Hindi as a Senior Sub Editor in the regional section (Uttar Pradesh, Uttarakhand, Haryana and Himachal Pradesh). Active in Journalism for more than 7 years. She started her j…और पढ़ें