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Ghazipur famous imarti : इमरती खाना किसे नहीं पसंद. गाजीपुर के महुआ बाग चौराहे पर तीन पीढ़ियों से चली आ रही सनी पाल की दुकान अपनी खास उड़द दाल से बनी इमरती के लिए मशहूर है. महज ₹25 प्रति पीस मिलने वाली यह कुरकुरी और रसीली इमरती अपनी अनूठी जालीदार बनावट और पारंपरिक स्वाद के कारण गाजीपुर के लोगों की पहली पसंद बनी हुई है. ऐसी इमरती आपने कभी नहीं खाई होगी. यहां रोजाना 150 से 200 पीस चुटकियों में बिक जाते हैं. लोग अक्सर जलेबी और इमरती को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है.

महुआ बाग चौराहे की इस पुरानी दुकान पर सुबह 9 बजते ही कड़ाही में शुद्ध घी-तेल की महक महकने लगती है. तीन पीढ़ियों से यहीं जमी सनी पाल की दुकान का यह वो जादुई पल है, जब खौलते तेल में उड़द दाल के बैटर से बनती बारीक धारें इमरती का रूप लेने लगती हैं. यहीं से शुरू होती है गाजीपुर की सुबह. ऐसी इमरती आपने कभी नहीं खाई होगी.

भागदौड़ भरी इस दुनिया में जहां हर चीज मशीन और फास्ट फूड में बदल रही है, वहीं सड़क किनारे लगी सनी पाल की यह छोटी सी दुकान आज भी पारंपरिक स्वाद की धौंस जमाए हुए है. दादा से शुरू हुआ यह सफर आज पोते तक पहुंचा है. गाजीपुर के लोगों के लिए यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि शहर की मीठी याद बन चुका है.

कारीगर के हाथ में सींक पर सजी इन इमरतियों का यह गुच्छा चीख-चीख कर बताता है कि यह सिर्फ धंधा नहीं, एक साधना है. पीछे रखी टोकरी इस बात की गवाही है कि यहां रोजाना 150 से 200 पीस चुटकियों में बिक जाते हैं. इसे बनाने के लिए कलाई का जो बैलेंस चाहिए, वो सालों की मेहनत के बाद आता है.

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कड़ाही से निकलकर सीधे छननी पर आती ये सुनहरी इमरतियां कुछ ही सेकंड में अपनी क्रिस्पी परत ओढ़ लेती हैं. इसके बाद इन्हें गुनगुनी चाशनी में उतारा जाता है, जहां ये मिठास को अपने रेशे-रेशे में सोख लेती है. यही वो प्रक्रिया है, जो सनी पाल की इमरती को ऊपर से कुरकुरा और अंदर से जूसी बनाती है.

सुबह 9 बजे से लेकर शाम 7 बजे तक दिन में दो बार कड़ाही में यही ताजा बैटर उतारा जाता है, ताकि हर ग्राहक को बासी नहीं बल्कि बिल्कुल गरमागरम इमरती परोसी जा सके. दशकों बीत गए, जमाना बदल गया, लेकिन इस दुकान पर चूल्हा जलने का यह नियम आज भी पूरी ईमानदारी से निभाया जाता है.

लोकल 18 से सनी बताते हैं कि लोग अक्सर जलेबी और इमरती को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है. जहां जलेबी मैदे के खमीर और गोल-मटोल चक्रों से बनती है, वहीं इमरती पूरी तरह उड़द की दाल के पेस्ट से तैयार होती है और इसके बीच में एक खूबसूरत फूलनुमा जालीदार चक्र होता है. महज ₹25 प्रति पीस मिलने वाली यह इमरती अपने यूनिक टेक्सचर और स्वाद के आगे सबको मात देती है.

चाशनी में नहाने के बाद जब ये सुनहरी इमरतियां टोकरी में सजती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी कलाकार ने खान-पान का कोई गुलदस्ता सजा दिया हो. इसी मनमोहक नजारे को देखने और चखने के लिए गाजीपुर के कोने-कोने से लोग खिंचे चले आते हैं. यहां का हर एक पीस अपने आप में मिठास की मिसाल है.

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