Air In Chips Packet: आपने भी कभी न कभी चिप्स का पैकेट खोलते ही यह जरूर सोचा होगा कि आखिर इतने बड़े पैकेट में चिप्स कम और हवा ज्यादा क्यों होती है. बाहर से फूला हुआ दिखने वाला पैकेट जैसे ही खुलता है, अंदर मुट्ठी भर चिप्स देखकर मन खट्टा हो जाता है. कई लोग इसे कंपनियों की चालाकी मानते हैं, तो कुछ इसे खुली ठगी तक कह देते हैं. सोशल मीडिया पर भी अक्सर ऐसे वीडियो वायरल होते रहते हैं, जिनमें लोग चिप्स के पैकेट में भरी “हवा” को लेकर सवाल उठाते हैं, लेकिन क्या वाकई कंपनियां ग्राहकों को बेवकूफ बना रही हैं? या फिर इसके पीछे कोई वैज्ञानिक वजह छिपी है?
दिलचस्प बात यह है कि पैकेट में भरी यह हवा सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होती, बल्कि चिप्स की क्वालिटी, स्वाद और सुरक्षा से सीधा जुड़ी होती है. आइए जानते हैं कि आखिर चिप्स के पैकेट में हवा क्यों भरी जाती है और इसका असली सच क्या है.
पैकेट में भरी होती है हवा नहीं, खास गैस
अधिकांश लोग मानते हैं कि चिप्स के पैकेट में वही सामान्य हवा भरी होती है, जिसमें हम सांस लेते हैं. लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. कंपनियां चिप्स के पैकेट में ऑक्सीजन वाली सामान्य हवा नहीं, बल्कि नाइट्रोजन गैस भरती हैं. नाइट्रोजन एक निष्क्रिय गैस होती है, जो खाने की चीजों को लंबे समय तक ताजा बनाए रखने में मदद करती है, अगर पैकेट में सामान्य हवा मौजूद रहे, तो उसमें मौजूद ऑक्सीजन चिप्स में इस्तेमाल होने वाले तेल और मसालों के साथ प्रतिक्रिया करने लगती है. इससे चिप्स का स्वाद बिगड़ सकता है, उनमें सीलन आ सकती है और उनकी खुशबू भी बदल सकती है.
नाइट्रोजन कैसे बचाती है स्वाद?
नाइट्रोजन गैस ऑक्सीकरण की प्रक्रिया को धीमा कर देती है. यही वजह है कि चिप्स लंबे समय तक कुरकुरे और स्वादिष्ट बने रहते हैं. यही तकनीक कई अन्य पैकेज्ड स्नैक्स और खाद्य पदार्थों में भी इस्तेमाल की जाती है.
लंबा सफर तय करते हैं चिप्स
फैक्ट्री से निकलने के बाद चिप्स सीधे आपकी दुकान तक नहीं पहुंचते. उन्हें गोदामों, ट्रकों और कई वितरण केंद्रों से होकर गुजरना पड़ता है. इस दौरान पैकेट कई बार इधर-उधर होते हैं, उन पर दबाव पड़ता है और झटके भी लगते हैं. अगर पैकेट में नाइट्रोजन गैस न हो, तो अधिकतर चिप्स टूटकर चूरा बन सकते हैं.
कुशन की तरह काम करती है गैस
पैकेट के अंदर मौजूद नाइट्रोजन एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है. यह चिप्स को झटकों से बचाती है और उन्हें टूटने से रोकती है. आसान भाषा में कहें तो यह एक एयर कुशन का काम करती है, जिससे पैकेट के अंदर मौजूद स्नैक्स सुरक्षित रहते हैं. यही कारण है कि जब आप पैकेट खोलते हैं, तो आपको ज्यादातर चिप्स सही आकार में मिलते हैं.
क्या कंपनियां ज्यादा पैसे वसूल रही हैं?
यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता है. जवाब है-नहीं.
खाद्य उत्पाद बेचने वाली कंपनियों के लिए यह अनिवार्य होता है कि वे पैकेट पर उत्पाद का नेट वेट यानी वास्तविक वजन स्पष्ट रूप से लिखें. चाहे पैकेट बड़ा हो या छोटा, ग्राहक उसी वजन के हिसाब से भुगतान करता है. उदाहरण के लिए, अगर पैकेट पर 50 ग्राम लिखा है, तो उसके अंदर मौजूद चिप्स का वजन 50 ग्राम ही होगा. ग्राहक पैकेट के आकार या उसमें मौजूद गैस के लिए अलग से भुगतान नहीं करता.
हालांकि, यह जरूर कहा जा सकता है कि बड़े और फूले हुए पैकेट ग्राहकों का ध्यान जल्दी खींचते हैं. मार्केटिंग की दुनिया में पैकेजिंग का बड़ा रोल होता है और कंपनियां आकर्षक पैकेट डिजाइन पर खास ध्यान देती हैं.
फूले हुए पैकेट के पीछे मार्केटिंग का गणित
दुकानों में टंगे बड़े और रंग-बिरंगे पैकेट ग्राहकों को ज्यादा आकर्षित करते हैं. खासकर बच्चे ऐसे पैकेट देखकर तुरंत उनकी ओर खिंचे चले आते हैं. इसके अलावा, फूला हुआ पैकेट शेल्फ पर ज्यादा दिखाई देता है और दूसरे उत्पादों के बीच अलग नजर आता है. यही वजह है कि कंपनियां पैकेजिंग को सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मार्केटिंग का हिस्सा भी मानती हैं.
बैक्टीरिया और फंगस से भी मिलता है बचाव
नाइट्रोजन गैस पैकेट के अंदर नमी और ऑक्सीजन को कम करती है. इससे बैक्टीरिया और फंगस पनपने की संभावना भी घट जाती है. यानी यह सिर्फ स्वाद ही नहीं बचाती, बल्कि खाद्य सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाती है. अगली बार जब आप चिप्स का पैकेट खोलें और उसमें ज्यादा गैस दिखाई दे, तो इसे धोखा समझने से पहले उसके पीछे की साइंस को जरूर याद करें. पैकेट में भरी नाइट्रोजन आपके चिप्स को ताजा, कुरकुरा और सुरक्षित रखने के लिए होती है. हां, आकर्षक पैकेजिंग मार्केटिंग का हिस्सा जरूर है, लेकिन इसे ठगी कहना पूरी तरह सही नहीं होगा.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)