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उत्तर प्रदेश का आगरा ताजमहल के साथ-साथ अपनी मशहूर मिठाई पेठे के लिए भी दुनियाभर में जाना जाता है. सफेद कद्दू से तैयार होने वाली यह मिठाई सदियों से लोगों की पसंद बनी हुई है. मुगलकाल से चली आ रही पेठे की परंपरा आज भी आगरा की गलियों में उसी स्वाद और शुद्धता के साथ कायम है.
आगरा: उत्तर प्रदेश के आगरा को ताजमहल ही नहीं, बल्कि यहां की खास मिठाई के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. आगरा की यह मिठाई मुगलकाल से अब तक तक बेहद मशहूर है. हम बात कर रहे हैं आगरा के पेठे की, जिसे सदियों से लोग खाते हुए आ रहे हैं. आगरा में बनने वाली यह मिठाई कई देशों में फेमस है. सफ़ेद कद्दू से बनने वाली यह मिठाई स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होती है.
आगरा में पिछले कई पीढ़ी से पेठे का कार्य कर रहे पेठा व्यापारी राजीव ने बताया कि सबसे पहले सफ़ेद कद्दू को छिला जाता है. कद्दू के छिलने के बाद उसे टुकड़ो में काटकर साफ पानी में धोया जाता है. इसके बाद इसे दो बार उबाला जाता है, जिससे यह आसानी से सॉफ्ट हो सके. उन्होंने कहा कि कई प्रक्रिया से गुजरने के बाद उसे चीनी के पानी में रखा जाता है. इसके बाद उसे सूखाकर तैयार किया जाता है. इसे तरह अन्य पेठे तैयार किये जाते हैं, उन्हें उनके आकार के रूप में काटा जाता है.
आगरा के प्राचीन और पेठा व्यापारी राजीव ने बताया कि पेठे की शुरुआत मुग़लकाल में हुई थी. उन्होंने कहा कि उनका यह पेठे का व्यापार काफी प्राचीन है. इससे पहले उनके पिता और दादा इस कारोबार को किया करते थे. वर्तमान में वह पेठे का कारोबार संभाल रहे हैं. उन्होंने कहा कि आगरा के पेठे की डिमांड आगरा ही नहीं, बल्कि बाहर विदेशों तक है. आगरा में आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक अपने साथ कई तरह के पेठों को पैक कराकर ले जाते हैं.
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उन्होंने कहा कि इस मिठाई कि खासियत है कि यह जल्दी खराब नहीं होती है और गर्मियों में यह शरीर को ठंडक देने का काम करती है. उन्होंने कहा कि जब मुगलकाल में पेठे की शुरुआत हुई थी, तब सिर्फ सादा सफेद पेठा बनाया जाता था. आज वर्तमान में समय के बदलने के साथ पेठे की कई वैरायटी भी मार्किट में आ गई है. उन्होंने कहा कि आगरा में आज 56 से अधिक प्रकार के पेठों को बनाया जा रहा है, जो काफी मशहूर है.
आगरा में कई पीढ़ी से पेठे का कारोबार कर रहे है पेठा व्यापारी राजीव ने बताया कि पिछले कई वर्षो से नूरी दरवाजे के पास उनकी दुकान है. पास में ही उनका गोदाम है, जहां पेठे को कारीगरों व मशीनों की ओर से बनाया जाता है. उन्होंने बताया कि पूरी तरह से शुद्धता के साथ इसे बनाया जाता है. राजीव ने बताया कि सबसे पहले सफेद कद्दू (पेठा) को छीलकर उसके अंदर का बीज और गूदा निकाल दिया जाता है. इसे अपनी पसंद के अनुसार चौकोर या छोटे टुकड़ों जिस भी आकार का पेठा बनाना है, उस आधार पर काट लिया जाता है. उसके बाद इसमें एक कांटे या नुकीली वस्तु की मदद से इन टुकड़ों में चारों तरफ अच्छे से गहरे छेद कर देते हैं, ताकि चाशनी अंदर तक जा सके.
व्यापारी ने बताया कि इसके बाद एक बर्तन में पानी और चूना मिलाकर अच्छे से घोल लेते हैं. फिर इसमें कद्दू के टुकड़ों को रातभर या 5-6 घंटे के लिए भिगोकर रख देते हैं. इस प्रक्रिया से पेठे को सख्त और क्रिस्पी बनाना आसान हो जाता है. उन्होंने बताया कि इसके बाद पेठे को चूने के पानी से निकालकर टुकड़ों को सादे पानी में 2 से 3 बार अच्छी तरह से धोना होता है. फिर इन्हें करीब 10 से 15 मिनट तक सादे पानी में उबाले जाते हैं, जब तक कि वे हल्के पारदर्शी ना दिखने लगे.
इस प्रक्रिया के बाद पेठे की मिठास के लिए एक बड़ी कड़ाही में चीनी और थोड़ा सा पानी में मिलाकर इसकी चाशनी बनानी होती है. जब चीनी घुल जाए, तो उबले हुए पेठे के टुकड़े इसमें डाल दें. इसे तब तक पकाएं जब तक कि चाशनी दो तार की गाढ़ी न हो जाए और पेठे में अच्छी तरह से समा न जाए. इसके बाद पेठे में अंत में इलायची पाउडर या केवड़ा एसेंस मिलाया जा सकता है. पेठे के टुकड़ों को चाशनी से निकालकर जाली पर रखा जाता है, जिससे पेठे में अतिरिक्त चाशनी बाहर निकल जाए और इस तरह से पेठे को बनाकर तैयार किया जाता है.