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पैकेज्ड स्नैक्स आने से पहले, लंबे सफर के लिए बेस्ट हैं 6 ट्रेडिशनल फूड्स!

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Traditional Indian Travel Snacks: आज के पैकेज्ड स्नैक्स आने से पहले, लंबी यात्राओं का भरोसा मम्मी के हाथ के ऐसे खाने पर होता था, जो स्वाद में लाजवाब और हफ्तों तक खराब ना होने वाला होता था. बस एक डब्बा भर घर का बना खाना और सफर निश्चिंत. इन पारंपरिक व्यंजनों में ना तो फ्रिज की जरूरत पड़ती थी और ना प्रिजर्वेटिव की. जानिए ऐसे ही 6 ट्रेडिशनल फूड्स, जो कभी हर सफर के अनिवार्य साथी हुआ करते थे…

Traditional Indian Travel Snacks: ब्रांडेड वेफर्स और वैक्यूम-पैक बिस्किट्स के जमाने से बहुत पहले, भारतीय यात्री ऐसे खाने पर निर्भर रहते थे जो जरूरत के हिसाब से बनाए जाते थे: आसानी से ले जाने लायक, ज्यादा कैलोरी वाले, गर्मी में भी खराब न होने वाले और स्वाद में भी लाजवाब. ये खाने की चीजें साधारण, व्यावहारिक और सोच-समझकर चुनी जाती थीं ताकि बिना फ्रिज के भी लंबी यात्रा में टिक सकें. यहां हम बता रहे हैं ऐसी 6 चीजों के बारे में, जो बैलगाड़ी, नाव या शुरुआती ट्रेनों में सफर करने वालों का पेट भरती थीं, ये क्या थीं, क्यों पसंद की जाती थीं और परिवार इन्हें कैसे तैयार करते थे.

खाखरा – पश्चिमी भारत की पतली, भुनी हुई रोटी यानी खाखरा असल में पकी और सुखाई गई रोटी होती है, जो लंबे समय तक खराब नहीं होती. गेहूं के आटे की बहुत पतली लोई बनाकर बिना तेल के तवे पर सेंकी जाती है, जिससे ये कुरकुरी हो जाती है. परिवार इसे कपड़े में लपेटकर, थोड़ा घी लगाकर टिन में पैक करते थे. इसे सादा, गुड़ के साथ या फिर अचार के साथ खाया जाता था. इसकी लंबी शेल्फ लाइफ और हल्के वजन के कारण आसानी से पैक करके लेकर जा सकते हैं.

ठेकुआ और मीठे लड्डू – ठेकुआ (बिहार की सख्त, गेहूं और गुड़ से बनी कुकी) और तरह-तरह के लड्डू (बेसन, तिल या नारियल के) सफर के लिए क्लासिक मिठाइयां थीं. इनमें चीनी या गुड़ की मात्रा इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखती थी और इनका सूखा, ठोस टेक्सचर टूटने-फूटने से बचाता था. घरों में इन्हें पहले से बनाकर पत्ते या कागज में लपेटा जाता था और घी व भूने आटे का इस्तेमाल नमी कम करने के लिए किया जाता था. ये जल्दी एनर्जी देते थे, कई दिन तक चलते थे और त्योहारों के मौके पर भी काम आते थे.

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सत्तू और भूना चना – सत्तू (भुने चने का आटा) और साबुत भूना चना या मूंगफली प्रोटीन का प्राचीन और आसान स्रोत थे. सत्तू को आटे के रूप में ले जाया जाता था और जरूरत पड़ने पर पानी या मट्ठे में मिलाकर पी लिया जाता था. भूना चना और मूंगफली बिना किसी तैयारी के खाए जा सकते थे और धीरे-धीरे एनर्जी देते थे. मध्य और पूर्वी भारत में यात्री छोटे मिट्टी के बर्तनों में सत्तू रखते थे, जिसे दही या गुड़ के साथ मिलाकर भरपेट और ठंडा करने वाला खाना बन जाता था, जो ताजे दाल-चावल से ज्यादा टिकाऊ था.

मुरमुरा/चिवड़ा – फूला हुआ चावल (मुरमुरा) और उसका मसालेदार मिश्रण (चिवड़ा) हल्के-फुल्के सफर के खाने का सबसे अच्छा उदाहरण है. दुकानदार और घरों में बड़े बैच में मुरमुरा बनाया जाता था, जिसमें मूंगफली, भूनी दालें, करी पत्ता और नींबू या नमक मिलाया जाता था. मुरमुरा हल्का होने के साथ-साथ पेट भरने वाला होता है, जो लंबे सफर में भूख मिटाने के लिए बढ़िया है. इसमें थोड़ी नमी आने पर भी जल्दी खराब नहीं होता और इसे टिन से बार-बार निकाला जा सकता है.

अचार और संरक्षित चटनियां – अचार की एक छोटी शीशी भी साधारण खाने को स्वादिष्ट बना देती थी. तेल, नमक और सिरका या कच्चे आम से बने अचार स्वाद के साथ-साथ प्रिजर्वेटिव का भी काम करते थे. तेल या गाढ़ी चीनी की चाशनी में डूबे फल और सब्जियों के अचार गर्मी और लंबे सफर में भी खराब नहीं होते थे. ये छोटे, तीखे और पुराने रोटी या चावल के स्वाद को भी बेहतर बना देते थे, खासकर जब ताजा गर्म खाना मिलना मुमकिन ना हो.

आम पापड़ और धूप में सुखाए फल – धूप में सुखाया गया आम पापड़ और दूसरे फलों के प्रिजर्व्स फलों को पतली, लचीली शीट में बदल देते थे, जो सफर में आसानी से साथ ले जाए जा सकते थे. इसी तरह, धूप में सुखाए केले, आम और दूसरे फल नमी निकालकर जल्दी खराब होने से बच जाते थे और इनका स्वाद भी गाढ़ा हो जाता था. इन्हें अक्सर मोम वाले कागज या केले के पत्ते में लपेटकर सामान के बीच में रखा जाता था, जिससे ये सूखे रहते थे. ये सफर के नमकीन खाने के साथ मीठा और खट्टा स्वाद जोड़ते थे.

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