2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की सियासत में एक नया नैरेटिव तैयार हो रहा है और वो नैरेटिव है सॉफ्ट हिंदुत्व का। जहां एक तरफ बीजेपी का हार्डकोर हिंदुत्व एजेंडा है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव भी सॉफ्ट हिंदुत्व के राह पर बढ़ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या बिना हिंदुत्व के यूपी की सत्ता का रास्ता तय नहीं हो सकता?

एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कड़क हिंदुत्व, राम मंदिर का गौरव और मथुरा-कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ कार्ड, इटावा में बन रहा भव्य केदारेश्वर मंदिर, और ‘सनातन ही समाजवाद है’ के नए पोस्टर…सवाल है कि क्या 2027 में ‘PDA’ के साथ ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ को मिलाकर अखिलेश यादव, योगी आदित्यनाथ के अभेद्य किले में सेंध लगा पाएंगे, या बीजेपी का ये आरोप सही साबित होगा कि चुनाव आते ही सपा को मंदिर याद आते हैं?

अखिलेश यादव का नया पॉलिटिकल ‘शिफ्ट’

सबसे पहले समझते हैं कि अखिलेश यादव का यह नया पॉलिटिकल ‘शिफ्ट’ क्या है? पिछले कुछ महीनों से समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों को यह समझ आ चुका है कि केवल एम-वाई (MY) या पारंपरिक सोशल इंजीनियरिंग से योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व ब्रांड का मुकाबला करना आसान नहीं है।

इसी रणनीति के तहत अखिलेश यादव ने कई बड़े कदम उठाए हैं। इटावा में केदारनाथ की तर्ज पर एक विशाल और भव्य केदारेश्वर मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है। अखिलेश ने इसका वीडियो शेयर किया, तो राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई कि यादव वोट बैंक और हिंदू अस्मिता को जोड़ने के लिए अखिलेश ने कदम बढ़ा दिए। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से अखिलेश यादव की मुलाकात और उसके ठीक बाद लखनऊ में सपा दफ्तर के बाहर लगे पोस्टरों पर लिखा जाना “सनातन ही समाजवाद है” ने कई मायनों में संकेत दिए, लेकिन क्या बीजेपी और योगी आदित्यनाथ अखिलेश यादव के इस सॉफ्ट हिंदुत्व के आगे खामोश हैं? बिल्कुल नहीं!

दिखावटी, बनावटी और सजावटी का आरोप

सीएम योगी आदित्यनाथ और बीजेपी का रुख बेहद स्पष्ट है। बीजेपी लगातार अखिलेश यादव पर यह हमला बोल रही है कि उनकी आस्था ‘दिखावटी, बनावटी और सजावटी’ है। बीजेपी याद दिलाती है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के समय सपा के कार्यकाल में कैसे कारसेवकों पर गोलियां चली थी, योगी आदित्यनाथ हर मंच से ये दोहराते हैं कि सपा के हाथ खून से रंगे हैं, और जो लोग राम मंदिर निर्माण का विरोध कर रहे थे आज वो राम भक्त बन बैठे हैं, अब चुनाव पास आते ही उन्हें महादेव और कृष्ण क्यों याद आ रहे हैं। 

बीजेपी ने खासतौर पर राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर जिस तरह से अखिलेश घेर रहे है उसकी काट मथुरा से निकली है। योगी ने तो अखिलेश को सीधा चुनौती दे दी है कि अगर वो सचमुच के सनातनी हैं, तो खुलकर कहे कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराया जाना चाहिए, अखिलेश इसका खुद नेतृत्व करें। अयोध्या से मथुरा तक बीजेपी का एजेंडा क्लियर है। बीजेपी का हिंदुत्व सिम्बॉलिक नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल है। राम मंदिर निर्माण के बाद अब मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा और काशी का विकास बीजेपी के लिए हिंदुत्व के केंद्र में है।

योगी आदित्यनाथ की छवि ‘कट्टर सनातन रक्षक’ की

योगी आदित्यनाथ की छवि एक ‘कट्टर सनातन रक्षक’ की है। जनता के बीच बीजेपी यह संदेश देने में सफल भी रही है कि उनका हिंदुत्व चुनावी नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा की बुनियाद है। अब सवाल उठता है- अखिलेश यादव यह रिस्क क्यों ले रहे हैं? राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अखिलेश यादव 2027 के लिए एक ‘डबल इंजन’ रणनीति पर काम कर रहे हैं। पहला इंजन (PDA): पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को सामाजिक न्याय और जातीय जनगणना के मुद्दे पर एकजुट करना।  दूसरा इंजन (सॉफ्ट हिंदुत्व): गैर-यादव ओबीसी और उन हिंदू मतदाताओं को अपने साथ जोड़ना, जो बीजेपी की नीतियों से थोड़े असंतुष्ट हैं, लेकिन किसी ऐसी पार्टी को वोट नहीं देना चाहते, जिसे वे ‘हिंदू विरोधी’ मानते हों।

कुल मिलाकर, 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव सिर्फ विकास या बेरोजगारी पर नहीं, बल्कि हिंदुत्व के अलग-अलग रूपों के टकराव पर भी लड़ा जाएगा। एक तरफ योगी आदित्यनाथ का परखा हुआ और समझौता-रहित ‘कड़क हिंदुत्व’ है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव का ‘PDA प्लस सॉफ्ट हिंदुत्व’ का नया प्रयोग, क्या अखिलेश यादव का केदारेश्वर मंदिर और ‘सनातन’ कार्ड यूपी की जनता को भाएगा, या योगी आदित्यनाथ का हिंदुत्व का किला 2027 में भी अजय रहेगा।

उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह मोड़ बेहद दिलचस्प है। एक तरफ योगी आदित्यनाथ की समझौता-रहित ‘विचारधारात्मक स्पष्टता’ तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव का ‘सामाजिक-समीकरण और आस्था’ का संतुलन साधने का प्रयास। 2027 का संग्राम ये भू तय करने की परीक्षा होगी कि यूपी की जनता के लिए ‘कड़क हिंदुत्व’ का भरोसा बड़ा है या ‘PDA+आस्था’ का नया विकल्प। योगी के पास जहां अपने कैडर का अटूट विश्वास और वैचारिक स्पष्टता है, वहीं अखिलेश के सामने चुनौती यह साबित करने की होगी कि उनका ‘सनातन प्रेम’ केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि दिल से जुड़ा मुद्दा है।





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