इंडिया टीवी के कार्यक्रम ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में सोनिया गांधी की प्रस्तावित किताब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ को लेकर चर्चा हुई। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, विनोद अग्निहोत्री और पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर भी मौजूद रहे। विश्लेषकों ने किताब के प्रकाशन, कथित फैक्ट चेक और उसमें शामिल बताए जा रहे विवादित अंशों पर अपनी राय रखी।
सोनिया गांधी की किताब को लेकर विवाद
कार्यक्रम में चर्चा के दौरान बताया गया कि किताब की भारत में प्रकाशन प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आया है। पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया की ओर से कहा गया कि वह भारत में इस किताब का प्रकाशक नहीं है। साथ ही प्रकाशक ने यह भी कहा कि लेखकों को फैक्ट चेक और संपादकीय सुझाव देना प्रकाशन प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। प्रकाशक ने कहा कि वह किताब प्रकाशित करने के लिए इच्छुक था, लेकिन लेखक के साथ हुई गोपनीय चर्चाओं पर वह आगे टिप्पणी नहीं करेगा।
चर्चा के दौरान यह सवाल भी उठाया गया कि अगर एक ही प्रकाशन समूह की अंतरराष्ट्रीय शाखा किताब को प्रकाशित कर रही है, तो भारतीय शाखा की ओर से कुछ बदलावों या फैक्ट चेक को लेकर अलग रुख क्यों सामने आया। चर्चा के दौरान यह संभावना जताई गई कि भारत में प्रकाशित होने वाली सामग्री को लेकर कानूनी या तथ्यात्मक जोखिमों को लेकर प्रकाशक अधिक सतर्क हो सकता है।
सोनिया की किताब में क्या है?
कार्यक्रम में किताब की संभावित सामग्री को लेकर भी कई दावे चर्चा में आए। बताया गया कि सोनिया गांधी ने अपने बचपन, राजीव गांधी से मुलाकात, परिवार और राजनीति में आने की परिस्थितियों के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई मुलाकातों का भी उल्लेख किया है। चर्चा में यह भी कहा गया कि किताब में आरएसएस, चीन की ओर से भारतीय जमीन पर कथित कब्जे और मोदी सरकार के दौर से जुड़े राजनीतिक प्रसंगों पर उनके विचार हो सकते हैं।
2004 में सोनिया क्यों नहीं बनीं पीएम?
विश्लेषकों ने 2004 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने के घटनाक्रम पर भी चर्चा की। इस दौरान उनके मनमोहन सिंह के नाम पर विचार करने की संभावना, उस समय के राजनीतिक और बाहरी दबाव तथा सोनिया गांधी के निर्णय को लेकर अलग-अलग धारणाओं पर बात हुई। इसके अलावा सोनिया गांधी के राजनीतिक व्यवहार और उनके परिवार के साथ संबंधों का भी उल्लेख हुआ। विश्लेषकों ने कहा कि उनकी सार्वजनिक छवि अपेक्षाकृत संयमित रही है और आत्मकथा में निजी जीवन के साथ-साथ उन राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख महत्वपूर्ण होगा, जिनकी वे लंबे समय तक प्रत्यक्ष साक्षी रही हैं।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि किताब में कथित तौर पर कुछ ऐसे हिस्से हैं जिन पर प्रकाशक और लेखिका के बीच मतभेद हुआ। हालांकि इन हिस्सों की वास्तविक सामग्री और विवाद का अंतिम स्वरूप किताब के सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। कार्यक्रम के अंत में विश्लेषकों ने कहा कि किताब के प्रकाशित होने के बाद उसमें लिखी बातों पर अधिक ठोस चर्चा की जा सकेगी।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)