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Tapeworms in Fish: मानसून के दौरान फीताकृमि (Tapeworm) संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है. आमतौर पर लोग सोचते हैं कि यह सिर्फ पालक या पत्तागोभी जैसी सब्जियों तक सीमित है, लेकिन कुछ मछलियों में भी टेपवर्म या उसके लार्वा पाए जा सकते हैं. हालांकि, मछलियों में मिलने वाले टेपवर्म और सब्जियों से जुड़े परजीवी अलग-अलग होते हैं. मछली से होने वाला संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित या अधपकी मछली खाने से फैलता है. आइए जानते हैं इससे बचने का तरीका…
बारिश का मौसम अपने साथ कई तरह के संक्रमण भी लेकर आता है. इस दौरान फीताकृमि (Tapeworm) का खतरा बढ़ सकता है, जो दूषित भोजन या पानी के जरिए फैलता है. अक्सर लोग सोचते हैं कि फीताकृमि सिर्फ हरी सब्जियों में ही होते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. CDC के अनुसार, कुछ मछलियों में भी फिश टेपवर्म (Fish Tapeworm) पाया जा सकता है. इसका वैज्ञानिक नाम Dibothriocephalus latus है. अगर संक्रमित मछली को कच्चा या अधपका खाया जाए, तो यह परजीवी शरीर में संक्रमण फैला सकता है.
फिश टेपवर्म का संक्रमण आमतौर पर कच्ची या अधपकी मछली खाने से होता है. यह परजीवी इंसान की छोटी आंत (Small Intestine) में रहकर बढ़ता है. वहीं, सब्जियों से जुड़ा संक्रमण अक्सर सूअर के टेपवर्म (Pork Tapeworm) के अंडों या लार्वा के कारण होता है, जो संक्रमित मल के जरिए मिट्टी या सब्जियों तक पहुंच सकते हैं. अगर पत्तागोभी, फूलगोभी जैसी सब्जियों को बिना अच्छी तरह धोए या कच्चा खाया जाए, खासकर दूषित पानी के संपर्क में आने पर, तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है.
अगर फिश टेपवर्म शरीर में पहुंच जाए, तो यह छोटी आंत में रहकर पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकता है. गंभीर मामलों में यह आंत में रुकावट (Intestinal Obstruction) पैदा कर सकता है. इसके अलावा कुछ लोगों में पित्त नली (Bile Duct) या पित्ताशय (Gallbladder) से जुड़ी समस्याएं भी विकसित हो सकती हैं. इसलिए कच्ची या अधपकी मछली खाने से बचने और संक्रमण के लक्षण दिखने पर डॉक्टर से सलाह लेने की सलाह दी जाती है.
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फिश टेपवर्म इंसानों को संक्रमित करने वाले सबसे बड़े टेपवर्म में से एक माना जाता है. इसकी लंबाई लगभग 30 फीट तक हो सकती है. यह परजीवी आमतौर पर कच्ची, अधपकी या ठीक से न पकाई गई मीठे पानी की मछली खाने से शरीर में प्रवेश करता है. शरीर में पहुंचने के बाद यह छोटी आंत (Small Intestine) में रहकर बढ़ता है और समय के साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है.
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, कच्ची या अधपकी मीठे पानी की मछली खाने से फिश टेपवर्म जैसे परजीवी शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. खासतौर पर रोहू, कतला, मृगल, तिलापिया, पाबदा और टेंगरा जैसी कुछ मीठे पानी की मछलियों में यह जोखिम हो सकता है, यदि वे संक्रमित जल में पली हों या उन्हें अच्छी तरह पकाकर न खाया जाए. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी मछलियों में हमेशा टेपवर्म होता है. सही तरीके से साफ करके और अच्छी तरह पकाने के बाद इन्हें खाना आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है.
ध्यान रखें कि केवल नमक लगाकर, धुएं में सुखाकर (स्मोक्ड) या अचार बनाकर मछली को सुरक्षित नहीं माना जा सकता. इन तरीकों से फिश टेपवर्म के परजीवी पूरी तरह नष्ट नहीं होते. अगर मछली को कम तापमान पर पकाया जाए या अधपका खाया जाए, तो उसके लार्वा शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. विशेषज्ञों की सलाह है कि मछली को हमेशा अच्छी तरह पकाकर या अच्छी तरह तलकर ही खाएं. पर्याप्त तापमान (लगभग 63°C या उससे अधिक आंतरिक तापमान) पर अच्छी तरह पकाने से फिश टेपवर्म के लार्वा नष्ट हो जाते हैं. वहीं, कच्ची या अधपकी मछली खाने से संक्रमण का खतरा बना रहता है.
FDA के अनुसार, अगर मछली को लंबे समय तक स्टोर करना हो, तो उसे सही तापमान पर डीप फ्रीज करना जरूरी है. मछली को -20°C या उससे कम तापमान पर कम से कम 7 दिनों तक रखने या -35°C पर निर्धारित समय तक फ्रीज करने से फिश टेपवर्म जैसे परजीवियों का खतरा काफी कम हो सकता है. हालांकि, घरेलू फ्रीजर हमेशा इतना कम तापमान बनाए नहीं रख पाते, इसलिए मछली को अच्छी तरह पकाकर खाना सबसे सुरक्षित माना जाता है.
अगर फिश टेपवर्म शरीर में प्रवेश कर जाए, तो शुरुआत में कई लोगों में कोई लक्षण नहीं दिखते. लेकिन संक्रमण बढ़ने पर पेट दर्द, पेट में असहजता, दस्त, मतली या उल्टी, कमजोरी, वजन कम होना और विटामिन B12 की कमी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. गंभीर मामलों में यह छोटी आंत और पित्ताशय (गॉलब्लैडर) से जुड़ी समस्याएं भी पैदा कर सकता है. ऐसे लक्षण महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
फिश टेपवर्म संक्रमण से बचने के लिए कच्ची या अधपकी मछली खाने से बचें. मछली खरीदने के बाद उसे सही तरीके से फ्रीज करें और हमेशा अच्छी तरह पकाकर ही खाएं. अमेरिकी FDA के अनुसार, मछली का अंदरूनी तापमान पकाते समय कम से कम 63°C (145°F) तक पहुंचना चाहिए. इस तापमान पर फिश टेपवर्म जैसे परजीवी नष्ट हो जाते हैं और संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाता है.