नई दिल्ली. 1947 का बंटवारा भारतीय इतिहास का एक ऐसा पन्ना है, जिसका दर्द आज भी हर नाजुक दिल में महसूस होता है. जब भी इस मुद्दे पर फिल्में बनती हैं, तो अक्सर हिंसा और नफरत ज्यादा होती है. लेकिन, जाने-माने डायरेक्टर राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘पार्टीशन 1947’ बिल्कुल अलग और नाजुक रास्ता अपनाती है. यह फिल्म सिर्फ बॉर्डर खींचने या दो देशों के बंटवारे की कहानी नहीं है, बल्कि उस भयानक दौर में बॉर्डर पार बिखरी इंसानियत की दिल दहला देने वाली कहानी है, प्यार और नफरत की आग में पनपे अटूट रिश्तों की.

कहानी
फिल्म की कहानी हमें 1947 में वापस ले जाती है, जब देश की हवा में नफरत फैली हुई थी. 1947 में लाहौर के बैकग्राउंड में सेट यह कहानी पूछती है कि जो घर कल हमारा था, वह रातोंरात अजनबी कैसे हो गया? जिस पड़ोसी के साथ दशकों तक खुशियां बांटी, वह अचानक सिर्फ धर्म की वजह से कातिल कैसे बन गया? कहानी के सेंटर में सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) हैं. बंटवारे की आग में जब भीड़ और कट्टरता हावी हो जाती है, तो सिकंदर एक बेबस और मासूम बुजुर्ग हिंदू औरत ‘माई’ (शबाना आजमी) के लिए ढाल बन जाता है. सिकंदर का फैसला उस जमाने की नफरत की पॉलिटिक्स को सीधे चुनौती देता है. कहानी सिर्फ पॉलिटिकल बंटवारे तक ही नहीं रुकती. यह एक मुस्लिम आदमी और एक बुजुर्ग हिंदू औरत के बीच अचानक बनने वाले खूबसूरत और पवित्र मां-बेटे के रिश्ते को भी दिखाती है, जिसे कोई नक्शा या बॉर्डर कभी बांट नहीं सकता.

एक्टिंग
हाल के सालों में सनी देओल के लिए ‘कमबैक’ शब्द का इस्तेमाल अक्सर होता रहा है, लेकिन इस फिल्म में वे बिल्कुल नए अवतार में नजर आते हैं. राजकुमार संतोषी ने अपने पुराने ‘एक्शन स्टार’ वाले गुस्से का इस्तेमाल किया है, लेकिन इस बार सनी दर्शकों को अपनी चीख-पुकार से नहीं, बल्कि अपनी चुप्पी और आंखों की लाचारी से रुलाते हैं. सिकंदर के तौर पर उनकी परफॉर्मेंस बहुत मैच्योर और इमोशनल है. शबाना आजमी इस फिल्म की जान हैं. उन्होंने ‘माई’ के किरदार में जिद, मिठास, समझदारी और अपनी मातृभूमि के लिए इतने प्यार का मेल डाला है कि दर्शक उनसे जुड़ जाते हैं. वह सिर्फ एक किरदार नहीं हैं, बल्कि हर घर में दादी या नानी जैसी लगती हैं. सनी देओल जैसे जबरदस्त स्क्रीन प्रेजेंस वाले एक्टर के सामने, करण देओल एक अलग छाप छोड़ते हैं. अपने पिता की नकल करने के बजाय, वह अपने रोल में ईमानदारी और कॉन्फिडेंस दिखाते हैं. प्रीति जिंटा की स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म में एक अनोखी गर्मजोशी लाती है. अली फजल का शांत और मैच्योर किरदार फिल्म को बैलेंस करता है, जबकि अभिमन्यु सिंह का ‘याकूब पहलवान’ कट्टरता और कट्टरता के भयानक चेहरे को शानदार ढंग से सामने लाता है.

डायरेक्शन
राजकुमार संतोषी ने साबित कर दिया है कि वे न सिर्फ एक्शन और कोर्टरूम ड्रामा के मास्टर हैं, बल्कि उनमें इंसानी भावनाओं को पर्दे पर दिखाने की भी अनोखी काबिलियत है. संतोषी ने इस बात का बहुत ध्यान रखा है कि बंटवारे जैसे सेंसिटिव सब्जेक्ट पर बनी यह फिल्म सांप्रदायिक नफरत या भड़काऊ एजेंडा का शिकार न हो. फिल्म का पहला हाफ धीरे-धीरे किरदारों को बनाता है और दर्शकों को 1947 के माहौल में डुबो देता है. दूसरा हाफ इतना इमोशनली इंटेंस है कि थिएटर में मौजूद हर कोई हैरान रह जाता है. संतोषी का गुस्सा इस फिल्म में हिंसा से नहीं, बल्कि इंसानियत पर उठाए गए सवालों के जरिए दिखाया गया है.

सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और कैनवस पूरी तरह से इंटरनेशनल लगता है. 1947 में लाहौर की तंग गलियां, पुराने घर, जलते हुए बाजार, भीड़ का हंगामा और उस जमाने के कपड़े फिल्म का सेट और प्रोडक्शन डिजाइन इतना रियलिस्टिक है कि दर्शक 1947 के जमाने में डूबा हुआ महसूस करते हैं. कैमरावर्क न सिर्फ भयानक हिंसा को दिखाता है, बल्कि किरदारों के चेहरे के हावभाव को भी एक साथ कैप्चर करता है.

म्यूजिक
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) इसकी स्पिरिट को और मजबूत करता है. जहां भी टेंशन और हिंसा के सीन हैं, म्यूजिक बेचैनी बढ़ाता है, लेकिन सिकंदर और माई के बीच इमोशनल पलों में, बैकग्राउंड में बजने वाले सुरीले और उदास गाने आंखों में आंसू ला देते हैं. म्यूजिक कहानी के फ्लो में रुकावट नहीं डालता, बल्कि उसे बढ़ाता है.

कमियां
दुनिया की कोई भी फिल्म पूरी तरह से कमियों से खाली नहीं है. फिल्म का पहला हाफ कुछ जगहों पर थोड़ा धीमा लगता है, क्योंकि मेकर्स ने किरदारों के बैकग्राउंड को बनाने में बहुत समय लिया. फिल्म का ड्यूरेशन थोड़ा लंबा लगता है. अगर एडिटिंग टेबल पर 10-15 मिनट कम कर दिए जाते, तो फिल्म की पकड़ और मजबूत हो सकती थी. कुछ सीन में 90 के दशक का हल्का मेलोड्रामा दिखता है, जो आज के रियलिस्टिक सिनेमा को पसंद करने वाले दर्शकों को थोड़ा ज्यादा ड्रामैटिक लग सकता है.

अंतिम फैसला
‘बंटवारा 1947’ सिर्फ एक हिस्टोरिकल फिल्म नहीं है. यह सिनेमा के जरिए दिया गया एक गहरा मैसेज है. यह पूछती है, ‘जब हर जगह नफरत फैली हो, तो क्या आप तब भी इंसान बने रहने की हिम्मत रख सकते हैं?’ सनी देओल की शानदार एक्टिंग, शबाना आजमी की जादुई मौजूदगी और राजकुमार संतोषी का सेंसिटिव डायरेक्शन इस फिल्म को इस साल की सबसे जरूरी और कल्ट-क्लासिक फिल्मों में से एक बनाता है. देश बंट सकते हैं, जमीनें बंट सकती हैं, लेकिन इंसानियत कभी नहीं बंट सकती- यह इस फिल्म की सबसे बड़ी जीत है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.



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