दिल्ली में चल रही BRICS समिट ने फिर से दुनिया का ध्यान इस संगठन की बढ़ती हुई ताकत की तरफ खींचा है। ब्राजील, रूस, भारत और चीन से शुरू हुआ यह समूह अब साउथ अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया को मिलाकर 11 देशों के लिए मंच बन गया है। BRICS देशों में विश्व के लगभग 49.5 फीसदी लोग रहते हैं और ग्लोबल GDP में इनकी भागीदारी करीब 40 प्रतिशत है। लेकिन बड़ा प्रश्न ये है कि क्या बड़ी आबादी और इकोनॉमी वाला यह ग्रुप सच में एक ग्लोबल पावर है, जबकि इसके ज्यादातर मेंबर्स की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से जुदा हैं?

BRICS में 11 देश साथ लेकिन उनके हित अलग-अलग

बता दें कि चीन, BRICS को अमेरिकी लीडरशिप की पश्चिमी व्यवस्था के ऑप्शन के तौर पर खड़ा करना चाहता है। चीन इसके माध्यम से ग्लोबल साउथ में अपना रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन भारत BRICS को पश्चिम की खिलाफत वाला गठबंधन नहीं, बल्कि मल्टी-पोलर वर्ल्ड बनाने और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के मंच के तौर पर देखता है।

रूस और ईरान को है पश्चिम के ऑप्शन की तलाश

वहीं, रूस के लिए BRICS संगठन पश्चिमी प्रतिबंधों से बचाव, व्यापार के खातिर नए सहयोगी तलाशने और यह दिखाने का जरिया है कि वह इंटरनेशनल लेवल पर अलग-थलग नहीं है। इसके अलावा, ईरान की प्रॉयरिटी भी अमेरिकी प्रतिबंधों का ऑप्शन खोजना और गैर-पश्चिमी देशों के साथ अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाना है।

अमेरिका के पुराने स्ट्रैटेजिक पार्टनर हैं सऊदी और UAE

इसके उलट, सऊदी अरब और UAE, अमेरिका के पुराने स्ट्रैटेजिक पार्टनर माने जाते हैं। ऐसे में वे BRICS से जुड़कर अपने कूटनीतिक और आर्थिक विकल्प बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन वे वेस्टर्न कंट्रीज से संबंध तोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। अरब में मौजूद ऑयल प्रोड्यूसिंग नेशन होने के बावजूद सऊदी अरब, ईरान और UAE के बीच क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा को लेकर मतभेद भी हैं।

साउथ अफ्रीका, मिस्त्र और इथियोपिया को है इन्वेस्टमेंट की तलाश

वहीं, ब्राजील विकासशील देशों की आवाज को तेज करने और UN समेत तमाम वैश्विक संस्थाओं में ग्लोबल साउथ के देशों को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने पर जोर देता है। इसके अलावा, साउथ अफ्रीका के लिए अफ्रीकी हितों और इन्वेस्टमेंट जैसे मुद्दे अहम हैं। जहां मिस्र, विदेशी निवेश चाहता है, तो वहीं इथियोपिया इन्फ्रास्ट्रक्चर और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता को प्रॉयरिटी देता है। साथ ही, इंडोनेशिया अपनी आजाद विदेश नीति बनाए रखते हुए ट्रेड और इन्वेस्टमेंट के मौके बढ़ाना चाहता है।

आर्थिक आकार बड़ा लेकिन आपस में व्यापार है सीमित

आंकड़ों में देखें तो BRICS काफी प्रभावशाली नजर आता है। इसकी जनसंख्या G7 से कई गुना ज्यादा है और परचेजिंग पावर पैरिटी यानी PPP के आधार पर BRICS की ग्लोबल GDP में भागीदारी G7 से आगे निकल गई है। इसके मेंबर्स में चीन और भारत जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं हैं, जबकि रूस, सऊदी अरब, UAE और ईरान एनर्जी मार्केट में अहम स्थान रखते हैं।

अभी आपस में सिर्फ 20 फीसदी व्यापार करते हैं BRICS देश

इसके बावजूद भी BRICS के सदस्य देशों में Economic Integration काफी हद तक सीमित है। UN Trade and Development के मुताबिक, BRICS देशों का आपस में ट्रेड उनके टोटल ट्रेड का लगभग 20 फीसदी ही है। हालांकि, यह 2003 के मुकाबले करीब 13 गुना बढ़ चुका है। दूसरी तरफ चीन की इकोनॉमी और ट्रेड क्षमता बाकी सदस्य देशों से बहुत बड़ी होने की वजह ग्रुप के भीतर शक्ति संतुलन भी असमान नजर आता है। छोटे सदस्य देश नहीं चाहते कि पश्चिमी देशों के दबदबे के बजाय चीन का वर्चस्व स्थापित हो जाए।

तलाश रहे हैं डॉलर का ऑप्शन

BRICS के सदस्य देश लोकल मुद्राओं में व्यापार और ऑप्शनल पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा दे रहे हैं। BRICS की बड़ी उपलब्धि न्यू डेवलपमेंट बैंक भी है। दिसंबर 2025 तक न्यू डेवलपमेंट बैंक ने 139 प्रोजेक्ट्स के लिए करीब 42.9 अरब डॉलर का फाइनेंशिंग भी मंजूर की। यह बड़ी रकम है, लेकिन वर्ल्ड बैंक जैसी स्थापित संस्थाओं की तुलना में इसका साइज अभी छोटा है। लेकिन इसके लिए करेंसी एक्स्चेंज की आजादी और सदस्य देशों के बीच इकोनॉमिक कोऑपरेशन जैसी चीजों की जरूरत होगी।

ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत बनाने पर जोर

जैसा कि PM मोदी ने भी BRICS समिट 2026 में ग्लोबल लीडर्स को संबोधित करते हुए कहा कि BRICS को 20 साल हो चुके हैं और इसे अब रिजल्ट देना शुरू करना होगा। PM मोदी ने इस बात पर भी जोर दिया है कि ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत बनाना होगा। वैश्विक मंचों पर इसकी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रयास करना होगा कि नियम मानने वाले से नियम बनाने वालों में बदलें

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