हिंदी सिनेमा में अक्सर नायकों की परिभाषा उनकी शारीरिक क्षमता, दमदार डायलॉग डिलीवरी और एक्शन दृश्यों से तय होती है, लेकिन जब एक दो-ढाई घंटे की मुख्यधारा की फिल्म में सबसे बड़ा नायक दो पैरों पर चलने वाला इंसान नहीं, बल्कि चार पैरों वाला एक बेजुबान जीव बन जाए तो वह अनुभव अपने आप में अनूठा हो जाता है। निर्देशक अमित राय, जिन्होंने ‘ओएमजी 2’ जैसी सोचने पर मजबूर करने वाली और व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म से अपनी एक अलग पहचान बनाई है, इस बार दर्शकों के सामने ‘ओह माय डॉग’ लेकर आए हैं।
यह फिल्म केवल एक कुत्ते और उसके मालिक के प्यार की कोई सीधी-सादी कहानी नहीं है, बल्कि यह बेज़ुबानों के प्रति मानवीय क्रूरता, सामाजिक असमानता, बाल श्रम, अंग तस्करी और कानून व्यवस्था में फैली सड़ांध जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों को एक साथ छूने का प्रयास करती है। मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा में बच्चों और जानवरों को केंद्र में रखकर फिल्में बनाना हमेशा से एक जोखिम भरा काम रहा है। इसके बावजूद ‘ओह माय डॉग’ अपनी मासूमियत, भावनात्मक गहराई और मुख्य नायक ‘ऑस्कर’ के स्वैग के दम पर दर्शकों को एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है जहाँ आँखें नम भी होती हैं और चेहरे पर मुस्कान भी आती है। इस फिल्म के निर्देशक अमित राय से इंडिया टीवी ने खास बातचीत की है।
अमित राय ने साझा किया अपना व्यक्तिगत अनुभव
अमित राय से जब पूछा गया कि उन्होंने यह फिल्म क्यों बनाई, उनका उद्देश्य क्या था, फिल्म बनाने के पीछे उनका नजरिया क्या था और उन्हें यह आइडिया कहाँ से आया, तो उन्होंने अपने पालतू कुत्ते ‘ऑस्कर’ को घर लाने की कहानी साझा की। अमित राय ने बताया:
असल में मैं जब ऑस्कर को घर लाया था तो मेरा घर थोड़ा छोटा था उन दिनों, किसी ने बताया कि फेसबुक पर एक मिसिंग डॉग के अडॉप्शन के लिए पोस्ट डाला गया, उस डॉग के पैर में थोड़ी सी चोट लगी थी तो मैंने सोचा जाकर लेकर आते हैं उसको। आपको लगता है न कि एक ढेर में से खराब होता है, वो कई बार आपको लगता है कि ये मेरे हिस्से का है तो ये मैं ले लेता हूं। उसके पैर में चोट थी तो शेल्टरहोम वालों को लगा होगा कि इतने सारे कुत्तों के बीच वो कैसे पलेगा। मैं वहां पहुंचा, और उसे घर ले आया। ये इंसानी सोच होती है कि अगर आप कुछ कर रहे होते हैं तो आप अहंकार आ जाता है, आप कुछ कर रहे हैं, दान दे रहे हैं, आप किसी को पाल रहे हैं, आप किसी की दवा करा रहे हैं, उसे सुबह उठाकर घुमाने ले जा रहे हैं, आप किसी की सुसु-पॉटी साफ कर रहे हैं। अचानकर आपके मन में एक भाव आता है, एक कॉम्प्लेक्स आता है, एक ईगो आता है। ऐसे ही मेरे अंदर भी आया। मुझे लगने लगा कि मैं कितना अच्छा आदमी हूं, मैं इसे लेकर आया, मैं इसे डॉक्टर के पास लेकर जा रहा,मैं इसके लिए दवा लेकर आया, मैं इसके लिए शैंपू लेकर आया। रोज सुबह उठकर उसे घुमाने लेकर जा रहा हूं। एक महीने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं तो इसको पाल ही नहीं रहा हूं, बल्कि ये मुझे पाल रहा है।
बेजुबान की भाषा और इंसान के अंदर के अच्छे इंसान की उत्पत्ति
ऑस्कर के उनके जीवन में आने के बाद आए बदलावों और इस किरदार की प्रेरणा पर विस्तार से बात करते हुए निर्देशक ने कुत्ते और इंसान के रिश्ते की रूहानी गहराई को रेखांकित किया। अमित राय ने कहा:
ये मेरे अंदर जो तब्बदीली लेकर आया, मुझे मेरी जिम्मेदारियों का अहसास कराया, मैं कितने बजे सोया हूं, मुझे कब इसे लेकर जाना है, मैं कहीं भी हूं इसके बारे में पता करना है। वो कहते हैं न कि एक बच्चा मां को जन्म देता है, वैसे ही एक डॉग आपके अंदर के अच्छे इंसान को जन्म देता है। वो आपको भगवान के पास ले जाता है। तो मैंने सोचा कि अगर कहानी होगी न तो जितनी इंसान के पास ताकत है, उतना ही एक डॉग के पास है, हमको इसकी भाषा नहीं समझ आ रही, ये प्रॉब्लम है, लेकिन उसको सब समझ आ रहा है, हमको क्या दुख है, क्या रोग है, वो हमारी मृत्यु भी हर लेता है। वो आपका कैंसर डिटेक्ट कर लेता है, वो आपके सारे दुख सोख लेते हैं। आप नहीं जानते कि भगवान ने आपको एक ऐसा साथी दिया है जो सबसे बेस्ट है इस दुनिया में। मैं आपसे बात कर रहा हूं और वो मेरे राइट साइड में लेटा हुआ है। फिल्म में दो कुत्ते नजर आए हैं, एक जो खो जाता है, जिसको अप्पू खोज रहा है और दूसरा एक शख्स खो गया है, जिसे ऑस्कर खोज रहा है। वो कुत्ता अलग है, लेकिन उसका नाम ऑस्कर ही है, जो कि मेरे डॉग का नाम भी है। फिल्म में मेरा डॉग भी है,लेकिन उसके किरदार का नाम मोमो है, जो खो जाता है।
सेट पर बेजुबानों के साथ शूटिंग की चुनौतियां और अनुभव
फिल्म की शूटिंग के दौरान कुत्ते के साथ काम करने में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों, जरूरी मंजूरियों और शूटिंग की जटिलताओं के सवाल पर अमित राय ने अपनी बात रखी। उन्होंने बताया:
एनिमल वेलफेयर डिपार्टमेंट ने काफी सहियोग किया, उन्होंने पूरा प्रॉसेस बता दिया। हमारे यहां प्रॉसेस बहुत सरल है। बस ये था कि हमें डॉग के साथ थोड़ी करुणा के साथ काम करना है, जो कि हमने किया भी। शूटिंग अपने आप में ही एक कठिन चीज है, फिर चाहे वो क्राउड के साथ हो, एक्टर के साथ हो या जूनियर एक्टर के साथ हो या फिर जानवरों के साथ या फिर वीएफएक्स और सीजी के साथ ही काम क्यों न हो, क्योंकि हम जो कैप्चर करना चाहते हैं वो जिवंत दिखे, जो हम सोच रहे हैं, विजुअलाइज कर रहे हैं, वो दुनिया में तो हैं नहीं हमें उसमें जान भरनी है, उसे जीवंत करना है। वो अपने आप में मुश्किल काम है, लेकिन भगवान की कृपा से जो भी उन्होंने (डॉग) ने किया वो एक्सेप्शनल है, क्योंकि उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार किया है, जिसे इंसानों से कंपेयर नहीं किया जा सकता है, आप जो देख रहे हैं, उसमें बच्चा तो गैजेट की मदद से कर रहा है, लेकिन डॉग अपनी शरीर की मदद और सेंस की ताकत से कर रहा है। दोनों एक ही बराबर पर हैं कि मैं किस हद तक जाऊंगा तुम्हें बचाने के लिए और तुम किस हद तक जाओगे मुझे बचाने के लिए।