खुशी का मौका हो काजू कतली, किसी के घर जा रहे हों तो काजू कतली, त्योहारों का अवसर हो तो काजू कतली. ये मिठाई भारत की सबसे ज्यादा बिकने वाली और सबसे ज्यादा खाई जाने वाली फेवरिट मिठाई है….तो क्या आपको काजू कतली की कहानी मालूम है. ये कैसे बनी. कहां बनी. कैसे हिट हो गई. मेरे आफिस में अक्सर अलग अलग मौकों पर सबसे ज्यादा मिठाइयां एक जगह से दूसरी जगह तक घूमती है और उसमें सबसे ज्यादा यही है.
काजू कतली एक तरह की बरफी है. लेकिन बरफी होते हुए भी बर्फियों की रानी. इसके बनने की कहानी भी इसके स्वाद की तरह ही रोचक है. जब 90 के दशक में देश में उदारीकरण और बाजारीकरण ने कदमताल करते हुए एंट्री मारी तो मिठाइयों की दुनिया में फ्यूजन के बहुत प्रयोग होने लगे. सारे देश की हिट मिठाइयां हर जगह नजर आने लगीं. लेकिन किसी का जादू पहले भी चलता था और अब भी चलता है तो वो है काजू कतली.
दूध ओटाने का काम तो हमारे यहां शायद तब से हो रहा है जब से हमने मवेशी रखने शुरू किए. आग पर बर्तन रखकर खाने-पकाने का काम सीख लिया. सिंधू घाटी सभ्यता और इसके पहले बरफी जैसे व्यंजन बनाने का उल्लेख मिलता है. सिंधु घाटी सभ्यता के लोग दूध और चीनी को किण्वित करने और ऐसी मिठाइयां बनाना जानते थे.
काजू कतली के बारे में माना जाता है कि ये करीब 400 साल पहले भारत में ईजाद हुई . (news18 ai image)
मराठा साम्राज्य में कैसे बनाई गई
काजू कतली का ईजाद दक्षिण भारत के दक्कन में हुआ. वहीं से ये देशभर में फैली. अब तो ये हर किसी की पसंदीदा है. इसे बनाने का श्रेय 16वीं सदी में प्रसिद्ध शेफ भीमराव को जाता है. जो मराठा साम्राज्य के राजसी परिवार में मुख्य रसोइया थे. मराठों को मिठाई बहुत पसंद थी. भीमराव चाहते थे कि कोई नई मिठाई तैयार करें, जिससे राज परिवार को इंप्रैस कर सकें.
काजू की तब तक कोई मिठाई नहीं थी
कहा जाता है कि भीमराव जब ये मिठाई तैयार कर रहे थे तो उनके दिमाग में फारसी स्वीट हलवा-ए-फारसी भी था, जो बादाम और चीनी से बनाया जाता था. उन्होंने तय किया वो अब काजू से नए तरह की मिठाई बनाएंगे. काजू 16वीं सदी पुर्तगालियों द्वारा गोवा में लाई जा चुकी थी. इसके बाद वो दक्कन में फैली और पैदा होने लगी. काजू का क्रिस्पी स्वाद बहुत पसंद किया जाता था.
17वीं सदी में कड़ाह में काजू कतली की मिठाई बनाते मराठा शेफ भीमराव, कड़ाह में वो काजू पाउडर से बने सफेद पेस्ट को चला रहे हैं. (news18 ai image)
कैसे बनाया इसे
शेफ भीमराव के दिमाग में अगर काजू से मिठाई बनाने की बात आई तो वह ये भी चाहते थे कि वो जो भी मिठाई बनाईं तो पतली परत वाली हो. आम बरफियों की तरह मोटी नहीं. उन्होंने काजू को पहले कूटा और फिर सिल बट्टे पर खूब पीसा, जब तक कि ये पाउडर ना बन जाए. उन्होंने कड़ाह में गुलाब जल डाला और चीनी, जिससे चासनी बन जाए. गाढ़ी चासनी. फिर इसमें काजू के पाउडर को डालकर शुद्ध घी के साथ तब तक मिलाया जब तक ये पूरा मिश्रण पूरी तरह मिलकर सफेद पेस्ट की तरह ना लगने लगे. अब उन्होंने इसमें इलायची मिलाई.
पतली पट्टी बनाई और जब खाया तो ….
गरम पेस्ट को लंबी थाली में डालकर उसकी यथासंभव पतली पट्टी बनाई. इसे सूखा होने के लिए छोड़ दिया. इसके बाद जब ये ठंडा होकर ठोस हो गई तो भीमराव ने काट लिया. इसका स्वाद ऐसा था वो खुद इस पर मुग्ध हो गए. उन्होंने महसूस हो गया कि उन्होंने एक ऐसी खास मिठाई बना दी है, जो सभी को जरूर पसंद आएगी.
जब 400 साल पहली बार बनाई गई काजू कतली को गोल टेबल पर रखी खास ट्रे में पेशवा के सामने पेश किया गया. (news18 ai image)
अब इसे मराठा राजघराने में जब पेश किया गया तो ये देखने में दूसरी मिठाइयों से अलग थी. पतली और दूसरी बर्फियों की तुलना में ज्यादा सफेद. ऊपर चांदी का वर्क लगाने पर ये और भी खिल गई. चूंकि ये बहुत पतले परत वाली थी और काजू से बनाई गई थी इसलिए इसे नाम दिया गया काजू कतली. ये पहले महाराष्ट्र के लोगों को भायी. फिर देश में फैल गई.
मुगल काल से भी जुड़ी है इसकी एक कहानी
इसकी एक कहानी और भी है, जो मुगल काल से जुड़ी है. ये कहानी भी करीब 400 साल पहले की है. मुगल बादशाह जहांगीर के समय की. ग्वालियर किले की जेल में सिखों के छठे गुरु गुरु हरगोबिंद सिंह और 52 हिंदू राजा कैद थे. धीरे धीरे जहांगीर गुरु हरगोविंद से प्रभावित होने लगा. उसने उन्हें रिहा करने का फैसला किया.
जश्न मनाने के लिए जहांगीर के शाही रसोइयों ने काजू, चीनी और घी से एक नई मिठाई बनाई, जिसे पतले टुकड़ों में काटकर बांटा गया. ये मिठाई इतनी पसंद आई कि प्रसिद्ध हो गई. इस मिठाई की खासियत ये है कि ये जल्दी बनती है और लंबे समय तक बगैर खराब हुए चल सकती है.
अब तो काजू कतली के कई नए रूप
काजू कतली अब केवल पारंपरिक मिठाई नहीं रही, बल्कि ये ना केवल प्रीमियम बल्कि फ्यूज़न मिठाई बन चुकी है. बड़े मिठाई ब्रांड अब इसके क्लासिक रूप से आगे निकलकर इसको कई फ्लेवर और वैरिएंट पेश कर रहे हैं. अब बाजार में ये केसर, गुलाब, चॉकलेट, अंजीर, पान, पिस्ता और शुगर-फ्री जैसे अनेक रूप उपलब्ध हैं. नागपुर जाएंगे तो वहां काजू कतली संतरे के फ्लेवर में भी बनी मिलेगी.
खाने के हिसाब से देखें तो ये कम मीठी और ग्लूटेन फ्री होती है. इसमें दूध नहीं मिला होता. अगर खास कटिंग इसकी एक पहचान है तो मुंह में रखते ही ये काजू के मधुर स्वाद के साथ मुंह में घुलने लगती है.
बरफी कहां से आई
काजू कतली एक तरह की बरफी ही है. बरफी फारस से तब आई जब मुगलों ने इधर रुख किया. कुछ का कहना है कि फारस से आने वाले व्यापारी इसे लेकर आए. खैर जो भी हो लेकिन बरफी मूलतौर पर फारसी शब्द है. जो बर्फ से बना है, इसका फारसी में शाब्दिक मतलब होगा, जमी हुई चीज. वैसे दुनिया में बरफी भारत से फैली. कहा जाता है कि 19वीं सदी के बीच जब भारत से गिरमिटिया मजदूर कैरिबियन देशों और मॉरीशस की ओर गए तो इसे वहां ले गए. वहां ये लोगों को बहुत भायी. अब तो खैर ये दुनियाभर में लोकप्रिय है.