नई दिल्ली. नेटफ्लिक्स की मशहूर फ्रैंचाइजी अपने तीसरे पार्ट ‘लस्ट स्टोरीज 3’ के साथ दर्शकों के बीच वापस आ गई है. पहले दो पार्ट की जबरदस्त सफलता के बाद, यह एंथोलॉजी पहले से कहीं ज्यादा मैच्योर, कॉन्फिडेंट और एक्सपेरिमेंटल लगती है. चार डायरेक्टर्स विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म सेक्सुअलिटी, रिश्तों की मुश्किलों और इंसानी इच्छाओं को बारीकी से दिखाती है. शानदार कास्ट और अनोखी कहानियों के साथ यह एंथोलॉजी इस फ्रैंचाइजी का अब तक का सबसे बैलेंस्ड और एंटरटेनिंग चैप्टर साबित होती है.
कहानी
‘लस्ट स्टोरीज 3’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानियों की डाइवर्सिटी है. चारों डायरेक्टर अपने अनोखे स्क्रीनप्ले के जरिए दर्शकों को अलग-अलग दौर और सेटिंग में ले जाते हैं:
- विक्रमादित्य मोटवानी का सेगमेंट: यह कहानी पार्टनर स्वैपिंग जैसे अजीब टॉपिक पर बात करती है. राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, विजय वर्मा और अभिषेक शर्मा स्टारिंग यह कहानी कोरियन फिक्शन के डार्क थ्रिलिंग टोन में बनाई गई है, जो बहुत नेचुरल लगता है.
- किरण राव का सेगमेंट: गुरफतेह पीरजादा और सना थम्पी स्टारिंग यह सेगमेंट पूरी तरह से अलग और हल्का-फुल्का माहौल बनाता है. कहानी ड्रग्स, मनी लॉन्ड्रिंग और फ्रॉड के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें ऐसे ट्विस्ट और टर्न हैं जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि आगे क्या होगा.
- शकुन बत्रा का सेगमेंट: अली फजल और राधिका मदान स्टारिंग यह कहानी मॉडर्न शादी के स्ट्रेस, थेरेपी, पुराने इमोशनल बोझ और अट्रैक्शन की मुश्किलों को दिखाती है. यह दिखाती है कि जब मेंटल और फिजिकल जरूरतें एक जैसी नहीं होतीं तो रिश्ते कितने कॉम्प्लेक्स हो सकते हैं.
- विशाल भारद्वाज का सेगमेंट: अदिति राव हैदरी, सिद्धार्थ और गजराज राव स्टारिंग यह ड्रामा दर्शकों को 1987 के समय में वापस ले जाता है. 1980 के दशक के बैकग्राउंड में सेक्स एजुकेशन के टॉपिक को दिलचस्प तरीके से पेश किया गया है, जिसमें न्यूक्लियस वोमिका और बेलाडोना जैसे होम्योपैथिक इलाज पर एक यूनिक ट्विस्ट है.
एक्टिंग
कलाकारों की परफॉर्मेंस इस एंथोलॉजी का दिल है. विक्रमादित्य मोटवानी के सेगमेंट में कोंकणा सेन शर्मा और विजय वर्मा की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री और आंखों में आंखें डालकर डायलॉग बोलना हैरान कर देने वाला है. राधिका आप्टे ने एक बार फिर मुश्किल और असहज किरदारों को आसानी से निभाने की अपनी काबिलियत साबित की है. शकुन बत्रा के सेगमेंट में अली फजल और राधिका मदान ने एक मॉडर्न शादी टूटने के दर्द और उथल-पुथल को बहुत बारीकी से दिखाया है. वहीं, किरण राव की कहानी में युवा एक्टर गुरफतेह पीरजादा और सना थंपी की फ्रेशनेस और एनर्जी साफ महसूस होती है. विशाल भारद्वाज की 1987 की फिल्म में गजराज राव की कॉमिक टाइमिंग और सीरियस एक्टिंग का बैलेंस शानदार है. अदिति राव हैदरी अपनी खूबसूरती और सादगी से स्क्रीन पर छा जाती हैं, जबकि सिद्धार्थ अपने किरदार के साथ पूरा न्याय करते हैं.
डायरेक्शन
चार अलग-अलग डायरेक्टरों का एक ही थीम पर काम करना और हर कहानी को एक अलग पहचान देना आसान नहीं है. लेकिन इस मामले में ‘लस्ट स्टोरीज 3’ पूरी तरह सफल रही है.
- विक्रमादित्य मोटवानी ने एक सेंसिटिव और बोल्ड सब्जेक्ट को बहुत सीरियसली और थ्रिल के साथ डायरेक्ट किया है, बिना किसी वल्गैरिटी के.
- किरण राव का डायरेक्शन पेपी, क्रिस्प और एंटरटेनिंग है. वह ऑडियंस को हल्की-फुल्की डार्क कॉमेडी की दुनिया में ले जाती हैं.
- शकुन बत्रा इंसानी रिश्तों और मॉडर्न शहरी रिश्तों की मुश्किलों को दिखाने में अपनी एक्सपर्टीज के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने यहां भी वही कमाल दिखाया है.
- विशाल भारद्वाज का सिनेमाई अंदाज अनोखा है. 1987 के दौर को फिर से बनाने और होम्योपैथी और सेक्स एजुकेशन का टच शामिल करने का उनका तरीका काफी अनोखा और बोल्ड है.
सिनेमैटोग्राफी
फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट शानदार है. कैमरावर्क और कलर टोन अलग हैं, जो हर डायरेक्टर की कहानी की अलग-अलग थीम को दिखाते हैं. विक्रमादित्य के हिस्से में डार्क और मूडी टोन का इस्तेमाल किया गया है, जो किरदारों के बीच के टकराव को दिखाता है. किरण राव के हिस्से में चमकीले और वाइब्रेंट रंग हैं, जो जवानी की एनर्जी को दिखाते हैं. शकुन बत्रा की फिल्म में रियलिस्टिक और इंटिमेट लाइटिंग का इस्तेमाल किया गया है, जबकि विशाल भारद्वाज के हिस्से में विंटेज 80s के टोन हैं, जो देखने वालों को पुरानी यादों की यात्रा पर ले जाते हैं.
म्यूजिक
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर हर कहानी के उतार-चढ़ाव को पूरी तरह से कॉम्प्लिमेंट करता है. विशाल भारद्वाज के हिस्से में उनका अपना म्यूजिक क्लासिकल और लोक धुनों का एक सुंदर मिश्रण पेश करता है, जो 1987 के माहौल को पूरी तरह से दिखाता है. दूसरी कहानियों में बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत ज्यादा लाउड नहीं है, लेकिन किरदारों की भावनाओं को बढ़ाने का काम करता है. सस्पेंस, थ्रिल और रोमांस सीन में साउंड डिजाइन बहुत ध्यान से किया गया है.
कमियां
हर एंथोलॉजी की तरह ‘लस्ट स्टोरीज 3’ में भी कुछ साफ कमियां हैं. चारों कहानियां एक जैसा असर नहीं छोड़तीं. जहां मोटवानी और भारद्वाज के हिस्से यादगार हैं, वहीं शकुन बत्रा का ड्रामा कभी-कभी थोड़ा धीमा और दोहराव वाला लगता है. कुछ जगहों पर रिश्तों की मुश्किलों को दिखाते हुए स्क्रीनप्ले की रफ्तार काफी धीमी हो जाती है. किरण राव स्टारिंग क्राइम-कॉमेडी सेगमेंट में कुछ ऐसे ट्विस्ट हैं जिनका ध्यान से देखने वाले दर्शक अंदाजा लगा सकते हैं.
अंतिम फैसला
‘लस्ट स्टोरीज 3’ सिर्फ फिजिकल अट्रैक्शन या ‘लस्ट’ पर फोकस करने के बजाय, इंसानी रिश्तों की अनकही परतों, शादीशुदा जिंदगी की कड़वी सच्चाई, अकेलेपन और चाहत को दिखाने की एक बहुत ही मैच्योर कोशिश है. शानदार कास्ट की परफॉर्मेंस और चार पुराने डायरेक्टरों के अलग नजरिए यह पक्का करते हैं कि यह एंथोलॉजी दिलचस्प न रहे. हालांकि कुछ कहानियां दूसरों की तुलना में थोड़ी कमजोर लग सकती हैं, कुल मिलाकर यह एक ताजा, एंटरटेनिंग और सोचने पर मजबूर करने वाली OTT पेशकश है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.