नई दिल्ली. 29 मई 2026 को थिएटर में रिलीज हुई ‘रिटर्न ऑफ द जंगल’ इंडियन एनिमेशन फिल्म का एक नया और देसी रूप है, जिसमें अनोखे सुपरहीरो और शानदार जादुई दुनिया है. मशहूर फिल्ममेकर वैभव कुमारेश के डायरेक्शन में बनी यह रंगीन फिल्म आज के स्कूली बच्चों की परेशानियों और बुली किए जाने के डर को हमारे पुराने ‘पंचतंत्र’ की कहानियों के साथ अच्छे से जोड़ती है. जब बच्चे अपनी परेशानियों का हल ढूंढने के लिए अपने दादाजी की गोद में बैठते हैं, तो यह सफर दर्शकों को सीधे उनके बचपन की सुनहरी यादों के खूबसूरत स्कूल तक ले जाता है.
कहानी
फिल्म ‘रिटर्न ऑफ द जंगल’ की कहानी आज के मॉडर्न शहरों में रहने वाले बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी, उनके मेंटल स्ट्रेस और उनकी मासूम परेशानियों पर आधारित है. फिल्म मिहिर नाम के एक सीधे-सादे स्कूल के लड़के और उसके करीबी दोस्तों के ग्रुप पर आधारित है. मिहिर और उसके दोस्त अपनी स्कूल लाइफ को एन्जॉय करना चाहते हैं, लेकिन उनकी जिंदगी में एक बड़ी चुनौती तब आती है जब स्कूल का एक बहुत ही घमंडी, शरारती और बदमाश लड़का उन्हें परेशान करना शुरू कर देता है. वह मिहिर और उसके दोस्तों का मजाक उड़ाता है, उनके लंच बॉक्स छीन लेता है और उन्हें मेंटली डराता है. छोटे शहरों और आज के माहौल में रहने वाले ये बच्चे डर, स्ट्रेस और लाचारी से पूरी तरह टूट चुके हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि इससे कैसे निपटा जाए. इस बड़ी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन ढूंढने के लिए, वे अपनी सबसे सुरक्षित और पसंदीदा जगह- अपने प्यारे दादाजी के पास पहुंचते हैं. आम तौर पर आजकल जब बच्चों को प्रॉब्लम होती है, तो माता-पिता या टीचर उन्हें सीधे डांटते हैं या कोई किताबी सॉल्यूशन बता देते हैं. हालांकि, यहां दादाजी का तरीका बिल्कुल अलग और पारंपरिक है.
सीधे उपदेश या किताबी ज्ञान देने के बजाय, दादाजी बच्चों को अपनी गोद में बिठाते हैं और एक घने, रहस्यमयी और जादुई जंगल के बारे में दिलचस्प कहानियां सुनाना शुरू करते हैं. ये कहानियां भारत के पंचतंत्र की पुरानी और मशहूर कहानियों को साफ तौर पर दिखाती हैं. इन कहानियों के मुख्य किरदार इंसान नहीं, बल्कि जंगल के जानवर हैं- शेर, सियार, कछुए और चालाक कौवे. इन जानवरों की बातचीत, समझदारी, हिम्मत और मुश्किल हालात के जरिए, दादाजी बच्चों को दोस्ती की असली कीमत, मुश्किल हालात में भी हिम्मत बनाए रखने की काबिलियत, समझदारी और समझ का सही इस्तेमाल और दूसरों के लिए हमदर्दी सिखाते हैं.
जैसे-जैसे दादाजी की कहानियां आगे बढ़ती हैं, फिल्म का स्क्रीनप्ले दिलचस्प तरीके से आज की और जंगल की मनगढ़ंत दुनिया के बीच बदलता रहता है. कहानियां सुनकर, मिहिर और उसके दोस्तों में गहरा साइकोलॉजिकल बदलाव आता है. वे इन जानवरों और पक्षियों की मुश्किलों से सीखते हैं कि डरकर भागने से परेशानियां खत्म नहीं होतीं- बल्कि समझदारी और एकता से सबसे ताकतवर ताकतों को भी दबाया जा सकता है. बच्चे इन कहानियों के गहरे मैसेज को अपनी असल स्कूल लाइफ में अपनाना शुरू करते हैं और बिना किसी हिंसा के, अपनी समझदारी से बदमाश लड़के की प्रॉब्लम का सॉल्यूशन ढूंढ लेते हैं. फिल्म का यह खूबसूरत तालमेल इसे सिर्फ टाइम-पास एंटरटेनमेंट फिल्म नहीं, बल्कि गहरी सीख से भरी एक फैमिली मूवी बनाता है.
डायरेक्शन
वैभव कुमारेश इंडियन एनिमेशन इंडस्ट्री में एक जाना-माना नाम हैं. उनकी सबसे बड़ी यूएसपी हमेशा यह रही है कि वह अपनी कहानियों को बिना किसी तामझाम या बनावट के, सिंपल लेकिन बहुत असरदार तरीके से दर्शकों के सामने पेश करते हैं. यह टैलेंट ‘रिटर्न ऑफ द जंगल’ में पूरी तरह दिखता है. वैभव कुमारेश ने एक डायरेक्टर के तौर पर, फिल्म की पेस को इतना स्मूद बनाए रखा है कि 1 घंटे 36 मिनट की यह फिल्म दर्शकों को एक पल के लिए भी बोर नहीं करती. उन्होंने आज के बच्चों की डिजिटल लाइफस्टाइल और पुरानी पंचतंत्र की कहानियों के बीच एक शानदार और भरोसेमंद ब्रिज बनाया है, जो तारीफ के काबिल है. डायरेक्टर का विजन साफ है- वह बच्चों को डराना या सिर्फ हंसाना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें उनकी जड़ों और भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत से मिलवाना चाहते हैं. वह अपने इस मकसद में पूरी तरह कामयाब रहे हैं.
एनिमेशन और विजुअल्स
टेक्निकली, ‘रिटर्न ऑफ द जंगल’ में एनिमेशन इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का है, लेकिन इसकी स्पिरिट पूरी तरह से देसी है. फिल्म का एनिमेशन और विजुअल पैलेट वाइब्रेंट, शानदार और रंगों से भरा है. फिल्म का जंगल के अंदर का हिस्सा बच्चों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है. हर पेड़ के पत्ते, बहती नदियां, हवा में उड़ते जुगनू और जंगल का माहौल स्क्रीन पर एक जादुई और पॉजिटिव एनर्जी पैदा करते हैं.
म्यूजिक
इस एनिमेटेड फिल्म की एक और बड़ी खूबी इसका शानदार और सुरीला म्यूजिक है. वेस्टर्न पॉप या लाउड म्यूजिक के इस जमाने में, मेकर्स ने फिल्म के गानों में पारंपरिक भारतीय भजनों, लोक धुनों और मिट्टी की खुशबू से प्रेरित इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल किया है. फिल्म के गाने न सिर्फ सुरीले और सुनने में अच्छे हैं, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने में भी मदद करते हैं. बच्चों को गाने बहुत पसंद आएंगे और वे उन्हें गुनगुनाने पर मजबूर हो जाएंगे. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी बहुत बढ़िया है. जब बच्चे स्कूल में डरे हुए होते हैं, तो म्यूजिक में एक खास सीरियसनेस होती है और जैसे ही कहानी जंगल में जाती है, बांसुरी और ढोलक की जुगलबंदी माहौल को पूरी तरह से जिंदादिल और जोश से भर देती है.
कमियां
हालांकि फिल्म एक मास्टरपीस है, लेकिन करीब से देखने पर कुछ छोटी-मोटी कमियां सामने आती हैं, क्योंकि यह फिल्म मुख्य रूप से बच्चों और फैमिली ऑडियंस के लिए है, इसलिए एंडिंग और कुछ सबप्लॉट काफी प्रेडिक्टेबल लगते हैं. एडल्ट और सीरियस ऑडियंस को इसमें कोई बड़ा ट्विस्ट या सस्पेंस नहीं मिल सकता है. क्लाइमैक्स, जहां मिहिर और उसके दोस्त अपनी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन ढूंढते हैं, उसे और डिटेल्ड और लॉजिकल बनाया जा सकता था. ऐसा लगता है कि फिल्म को 96 मिनट में खत्म करने की कोशिश में, कहानी के आखिरी 10 मिनट जल्दबाजी में डाले गए.
अंतिम फैसला
‘रिटर्न ऑफ द जंगल’ सिर्फ बच्चों के लिए एक रंगीन कार्टून फिल्म नहीं है, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ी एक खूबसूरत और इमोशनल जर्नी है. यह फिल्म हमें और हमारी नई पीढ़ी को उन सुनहरे दिनों की याद दिलाती है जब सोने से पहले दादा-दादी से कहानियां सुनना हर इंडियन परिवार में एक अटूट और पवित्र परंपरा थी. यह फिल्म इस जरूरी बात का सबूत है कि दुनिया की सबसे अच्छी और सबसे असरदार कहानियां हमेशा शानदार विजुअल इफेक्ट या हॉलीवुड की नकल से नहीं बनतीं, बल्कि सच्ची सोच और दिल से भी बनती हैं. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.