नई दिल्ली. जंतर मंतर में चल रहे आंदोलन के बीच आज ‘उत्तर दा पुत्तर’ देख आया हूं और दिल से कह रहा हूं कि मजा आ गया! सच में एकदम ताजा, हल्की-फुल्की और दिल छू लेने वाली कॉमेडी है. दिल्ली के मिडिल क्लास परिवार की कहानी, वास्तु के चक्कर, कर्म की बात… सब कुछ इतने रोचक अंदाज में पेश किया गया है कि हंसी भी आती है और सोचने को भी मजबूर करती है.

कहानी शुरू होती है प्रोफेसर साई राम टुटेजा से. अन्नू कपूर इस किरदार में कमाल के हैं. एक तरफ फिजिक्स पढ़ाते हैं, बच्चों को साइंस के नियम समझाते हैं, दूसरी तरफ खुद हर छोटी-बड़ी बात वास्तु, दिशा और शकुन-अपशकुन से जोड़ते हैं. घर का रुख उत्तर दिशा में होना चाहिए, काला कपड़ा नहीं पहनना चाहिए, ये करो वो मत करो… पूरी जिंदगी वास्तु के हिसाब से चल रही है. जब वह ‘परफेक्ट वास्तु’ वाला घर ढूंढते हैं और मिल जाता है, तब जो हादसा होता है ना, हंसी रोकना मुश्किल हो जाता है. पत्नी गिन्नी (रुखसार रहमान) तंग आकर घर छोड़ देती हैं और फिर प्रोफेसर अपने दोस्त मन्नू (बृजेंद्र काला) के साथ नई खोज पर निकल पड़ते हैं. बीच में पवन मल्होत्रा, जीवेशु अहलूवालिया, इश्तियाक खान जैसे किरदार आते हैं और कहानी को और मजेदार बना देते हैं.

अन्नू कपूर ही नहीं पूरी स्टारकास्ट दमदार

अन्नू कपूर की एक्टिंग तो जबरदस्त है. उनके चेहरे के भाव, बॉडी लैंग्वेज और डायलॉग डिलीवरी देखकर लगता है जैसे वही प्रोफेसर हमारे मोहल्ले में रहता हो. कभी गंभीर, कभी हंसाने वाले… दोनों तरफ बराबर का जलवा. पवन मल्होत्रा का किरदार भी लाजवाब है. उनकी कॉमिक टाइमिंग पुरानी यादें ताजा कर देती है. बृजेंद्र काला हमेशा की तरह अपना देसी अंदाज लिए हुए हैं. रुखसार रहमान ने पत्नी का रोल बहुत सहजता से निभाया है. बाकी कलाकार भी अपने-अपने किरदारों में फिट बैठते हैं.

हंसते-हंसते होने लगेगा पेट दर्द

अब बात कॉमेडी की. फिल्म की कॉमेडी एकदम लाजवाब है. कोई जोर-जबरदस्ती नहीं, कोई सस्ती गंदी चुटकुलेबाजी नहीं. हंसी स्वाभाविक आती है. सीलिंग फैन वाला सीन हो या घर की दिशा वाले चक्कर, सब इतने नेचुरल लगते हैं कि हंसते-हंसते पेट दर्द करने लगता है. दिल्ली की बोली, लोकल फ्लेवर और रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी बातें फिल्म को और करीब ला देती हैं.

फिल्म दे याद आएगी 1979 की ‘गोल माल’

इस फिल्म को देखकर पुरानी कॉमेडी फिल्मों की याद आना लाजमी है. जैसे 1979 वाली ‘गोल माल’ याद आती है, जिसमें अमोल पालेकर के झूठ और हास्य के चक्कर में पूरा परिवार उलझ जाता था. वैसे ही यहां भी प्रोफेसर के अंधविश्वास से परिवार और दोस्त सब फंस जाते हैं. ‘चुपके चुपके’ की याद भी आती है, जहां धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन के कॉमेडी टाइमिंग ने कमाल कर दिया था. उस फिल्म में भी साधारण सी बात को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था कि हंसी नहीं रुकती थी. ‘अंगूर’ में भी सनमही की गड़बड़ और जुड़वां किरदारों की कॉमेडी आज भी याद रहती है. ‘उत्तर दा पुत्तर’ भी उसी लाइन पर चलती है. साधारण लगने वाली चीज (वास्तु) को लेकर इतनी मजेदार स्थितियां पैदा कर दी गई हैं कि पुरानी फिल्मों का स्वाद मिल जाता है. हां, आजकल की फिल्मों की तरह तेज स्पीड है, लेकिन पुरानी फिल्मों वाली ईमानदारी और दिल की बात भी बरकरार है.

स्क्रिप्ट में दिल्ली का असली रंग

सबसे अच्छी बात ये है कि फिल्म सिर्फ हंसाती नहीं, सोचने पर भी मजबूर करती है. कर्म और वास्तु के बीच का धर्मसंकट बहुत रोचक तरीके से दिखाया गया है. प्रोफेसर बार-बार दिशा और किस्मत के पीछे भागते हैं, लेकिन जिंदगी उन्हें सिखाती है कि असली ताकत तो अपने कर्मों में होती है. कोई उपदेश नहीं, कोई भाषण नहीं। कहानी के जरिए ही ये बात समझ में आ जाती है. आखिर में जो संदेश मिलता है, वह पॉजिटिव और प्रेरणा देने वाला है. परिवार के रिश्ते, दोस्ती और खुद पर भरोसा… ये सब बातें दिल को छू जाती हैं.
निर्देशक रविंदर सिवाच की ये पहली फिल्म है, लेकिन काम अनुभवी जैसा लगता है. संदीप कपूर की कहानी को बेवजह नहीं खींचा गया. स्क्रिप्ट में दिल्ली का असली रंग है.म्यूजिक भी मूड के हिसाब से ठीक है.

हंसी संग थोड़ी सीख भी देगी ‘उत्तर दा पुत्तर’

कुल मिलाकर 1 घंटा 43 मिनट की ये फिल्म बिल्कुल बोर नहीं करती. अगर आप परिवार के साथ हल्की-फुल्की कॉमेडी देखना चाहते हैं, जिसमें हंसी भी हो और थोड़ी सीख भी, तो ‘उत्तर दा पुत्तर’ जरूर देखें. अन्नू कपूर का जलवा तो देखने लायक है ही, बाकी कलाकार भी साथ देते हैं. पुरानी कॉमेडी फिल्मों का स्वाद लेने वाले दर्शकों को ये फिल्म जरूर पसंद आएगी. सिनेमाघर जाकर एक बार देख लीजिए, मजा आ जाएगा. वास्तु वाला चक्कर छोड़िए, कर्म करिए और फिल्म का मजा लीजिए.



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