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पलामू के तुमागड़ा का कलाकंद अपनी शुद्धता के लिए मशहूर है. इसे पारंपरिक तरीके से धीमी आंच पर तैयार किया जाता है. स्वाद के लिए इसमें एक खास चीज मिलाई जाती है. रोजाना करीब एक क्विंटल दूध की खपत होती है. यात्री यहां रुककर इस लाजवाब मिठाई का स्वाद जरूर चखते हैं.

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पलामूः झारखंड की मिट्टी में जितनी विविधता है, उतनी ही मिठास यहां के खानपान में भी देखने को मिलती है. हर जिले की अपनी अलग पहचान, अलग बोली और अलग स्वाद है. इन्हीं खास स्वादों में एक नाम पलामू जिले के सतबरवा प्रखंड स्थित तुमागड़ा के प्रसिद्ध कलाकंद का भी है, जिसकी मिठास अब पूरे राज्य में अपनी अलग पहचान बना चुकी है. रांची से पलामू आने-जाने वाले यात्रियों के लिए यह जगह किसी स्वाद के पड़ाव से कम नहीं है.

एनएच-39 मार्ग पर स्थित तुमागड़ा में सड़क किनारे सजी कलाकंद की दर्जनों दुकानें लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं. यहां पहुंचते ही ताजा दूध और मिठाई की खुशबू यात्रियों को रुकने पर मजबूर कर देती है. यही वजह है कि रांची से डालटनगंज आने वाले अधिकतर लोग यहां रुककर कलाकंद का स्वाद जरूर चखते हैं. इतना ही नहीं, लोग अपने रिश्तेदारों और मेहमानों के लिए भी यहां से कलाकंद पैक कराकर ले जाना नहीं भूलते.

दुकान संचालक ने क्या कहा?
दुकान संचालक निरंजन चंद्रवंशी ने लोकल18 को बताया कि यहां का कलाकंद की सबसे बड़ी खासियत इसकी शुद्धता और पारंपरिक तरीके से तैयार होना है. आसपास के गांवों से रोजाना ताजा गाय और भैंस का दूध लाया जाता है. इसके बाद कारीगर घंटों मेहनत कर धीमी आंच पर इसे तैयार करते हैं. दूध को लगातार पकाकर उसमें सही मात्रा में मिठास मिलाई जाती है, जिससे इसका स्वाद बेहद लाजवाब बन जाता है. मुंह में जाते ही घुल जाने वाला यह कलाकंद हर उम्र के लोगों को पसंद आता है.

उन्होंने बताया कि यहां का कलाकंद सिर्फ आम लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि कई सेलिब्रिटी और बड़े अधिकारी भी पसंद करते हैं. कई लोग तो रांची से लौटते समय विशेष तौर पर तुमागड़ा रुककर मिठाई खरीदते हैं. यही कारण है कि यह मिठाई अब पलामू की पहचान बनती जा रही है.

ऐसे होता है तैयार
निरंजन चंद्रवंशी ने आगे बताया कि इस मिठाई को बनाने के लिए पलामू किला, छेमी टांड़ और मोहन टांड़ से खास तौर पर भैंस का ताजा दूध मंगाया जाता है. करीब 6 किलो दूध में लगभग 200 ग्राम चीनी मिलाकर इसे धीमी और सीमित आंच पर लगातार आधे घंटे तक पकाया जाता है. स्वाद और बनावट को खास बनाने के लिए इसमें संतुलित मात्रा में फिटकरी डाली जाती है, जिससे कलाकंद का असली स्वाद उभरकर आता है. लंबे समय तक पकाने के बाद करीब सवा दो किलो मिठाई तैयार होती है.

कभी 5 रुपए जोड़ा बिकती थी मिठाई
उन्होंने बताया कि पिछले 50 वर्षों से वो यह मिठाई तैयार कर रहे है. करीब 50 से 60 साल पुराने इस कारोबार में कभी यह मिठाई 5 रुपये जोड़ा बिकती थी, जो आज 15 रुपये प्रति पीस तक पहुंच गई है. रोजाना लगभग एक क्विंटल दूध की खपत से तैयार होने वाला यह कलाकंद आज भी लोगों की पहली पसंद बना हुआ.

जानें अभी की कीमत
कीमत की बात करें तो यहां का कलाकंद करीब 400 रुपये प्रति किलो के दर से बिकता है. स्वाद और गुणवत्ता के कारण लोग बिना मोलभाव के इसे खरीदना पसंद करते हैं. सड़क यात्रा के दौरान अगर आप भी कभी रांची से पलामू के रास्ते गुजरें, तो तुमागड़ा का यह मशहूर कलाकंद चखे बिना आगे बढ़ना शायद सबसे बड़ी गलती होगी.

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Prashun Singh

मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.



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