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ताजमहल ही नहीं, 500 साल पुरानी बेड़ई-जलेबी भी है आगरा की खास पहचान, जानिए खास

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उत्तर प्रदेश के आगरा की पहचान सिर्फ ताजमहल या पेठे तक सीमित नहीं है. यहां की बेड़ई-जलेबी की परंपरा भी सदियों पुरानी मानी जाती है. इतिहासकारों के अनुसार, मुगल काल से शुरू हुई यह परंपरा आज भी आगरा की सुबह और खानपान संस्कृति का अहम हिस्सा बनी हुई है.

उत्तर प्रदेश के आगरा में जलेबी का नाश्ता बेहद मशहूर है. इसे शहर के सबसे पुराने और लोकप्रिय नाश्तों में गिना जाता है. इतिहासकारों के अनुसार, 16वीं सदी में मुगलों के आगमन के बाद आगरा में जलेबी का प्रचलन तेजी से बढ़ा. उनका कहना है कि यदि बाबर के समय साल 1526 से गणना की जाए, तो आगरा और जलेबी का रिश्ता लगभग 500 साल पुराना माना जा सकता है.

आगरा में जलेबी का स्वाद मुगलकाल से अब तक चला आ रहा है. बताया जाता है कि पेठे से पहले यह व्यंजन आगरा में मुगलों को बेहद पसंद था. उस दौर में गिनी-चुनी मिठाइयां ही हुआ करती थीं. इतिहासकारों के अनुसार, मुगल काल में जलेबी को उत्सवों और दावतों की खास मिठाई माना जाता था. शाही भोज में परोसी जाने वाली यह मिठाई धीरे-धीरे हलवाइयों के माध्यम से बाजारों तक पहुंची और आम लोगों की भी पहली पसंद बन गई.

वर्तमान में आगरा की सुबह का स्वाद बेड़ई और गरमा-गरम जलेबी से शुरू होता है. करीब 500 साल पुरानी यह परंपरा आज भी शहर की पहचान बनी हुई है. सुबह होते ही पुराने बाजारों और प्रसिद्ध हलवाइयों की दुकानों पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है. मसालेदार बेड़ई के साथ चाशनी में डूबी कुरकुरी जलेबी का स्वाद स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों को भी खूब लुभाता है. यही वजह है कि यह नाश्ता आगरा की खानपान संस्कृति का अहम हिस्सा माना जाता है.

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उत्तर प्रदेश के आगरा में जलेबी सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि खुशियों और शुभ अवसरों का प्रतीक भी मानी जाती है. दीवाली, होली, दशहरा, रक्षाबंधन और शादी-विवाह जैसे आयोजनों में इसका विशेष स्थान है. आज भी कई शादियों में जलेबी को दही के साथ परोसा जाता है. पुराने समय से शुभ अवसरों पर रिश्तेदारों और मेहमानों को जलेबी खिलाने और बांटने की परंपरा चली आ रही है. आगरा के कई परिवार आज भी इस परंपरा को निभा रहे हैं, जिससे शहर की सांस्कृतिक और मिठास भरी विरासत जीवित है.

आगरा में कई हलवाई परिवार पीढ़ियों से जलेबी बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. शहर की कई पुरानी मिठाई की दुकानें वर्षों से इस विरासत को संभाले हुए हैं, जबकि कुछ प्रतिष्ठान 200 साल से अधिक पुरानी बेड़ई-जलेबी की परंपरा का दावा करते हैं. पारंपरिक तरीके से तैयार की जाने वाली कुरकुरी जलेबी आज भी लोगों की पहली पसंद है. यही वजह है कि यह मिठाई आगरा की खानपान संस्कृति और पहचान का अहम हिस्सा बन चुकी है.

आगरा के ताजमहल का दीदार करने आने वाले पर्यटक यहां के ऐतिहासिक स्मारकों के साथ स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेना भी नहीं भूलते. आगरा के मशहूर व्यंजनों में बेड़ई, कचौरी और जलेबी सबसे लोकप्रिय पारंपरिक नाश्तों में शामिल हैं. सुबह के समय शहर की प्रसिद्ध दुकानों पर पर्यटकों और स्थानीय लोगों की अच्छी-खासी भीड़ देखने को मिलती है. रसीली और कुरकुरी जलेबी के साथ मसालेदार बेड़ई का अनोखा स्वाद आगरा की इस पारंपरिक खानपान विरासत और पहचान को अलग बनाता है.

आगरा में समय और विकास के साथ जलेबी बनाने के तरीकों में कई बदलाव आए हैं, लेकिन इसका पारंपरिक स्वाद और पहचान आज भी बरकरार है. आगरा में सुबह की बेड़ई-जलेबी केवल एक नाश्ता नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानी जाती है. मुगल काल से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है. स्थानीय निवासी हों या पर्यटक, हर कोई इस ऐतिहासिक स्वाद का आनंद लेने के लिए सुबह-सुबह प्रसिद्ध हलवाइयों की दुकानों पर पहुंचता है.

आगरा के वरिष्ठ इतिहासकार और प्रोफेसर अनुराग पालीवाल ने बताया कि जलेबी का इतिहास सदियों पुराना है और इसका आगरा से गहरा जुड़ाव रहा है. उनके अनुसार, मुगल काल में यह मिठाई शाही रसोई से आम लोगों तक पहुंची और धीरे-धीरे शहर की खानपान संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई. उन्होंने बताया कि पारंपरिक जलेबी मैदा के घोल को कुछ समय तक खमीर उठने के लिए रखकर बनाई जाती है. इसके बाद उसे गर्म घी या तेल में गोल आकार में तलकर चाशनी में डुबोया जाता है, जिससे उसका कुरकुरा और रसदार स्वाद तैयार होता है, जो लोगों को काफी पसंद आता है.

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