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Bikaner Traditional Khichda Recipe: बीकानेर की परंपराओं में शामिल खिचड़ा एक खास व्यंजन है, जो साल में केवल दो बार अक्षय तृतीया और रामदेव जी की बीज पर बनाया जाता है. मरुस्थलीय जीवनशैली से जुड़ा यह व्यंजन गेहूं, बाजरा और दालों के मिश्रण से तैयार होता है, जो पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है. धीमी आंच पर पकने से इसका स्वाद और बढ़ जाता है. यह सिर्फ खाना नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है. आज भी नई पीढ़ी इस परंपरा को सीखकर आगे बढ़ा रही है.

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बीकानेर. मरुस्थल की तपती रेत और सीमित संसाधनों के बीच विकसित हुई परंपराएं यहां की पहचान है. इन्हीं परंपराओं में एक खास व्यंजन है खिचड़ा, जो साल में केवल दो अवसरों पर ही बनाया जाता है. यह अवसर हैं अक्षय तृतीया (आखातीज) और रामदेव जी की बीज. इन दिनों बीकानेर के लगभग हर घर में यह पारंपरिक खिचड़ा बनाकर परंपरा को जीवित रखा जाता है. आज के आधुनिक समय में जहां फास्ट फूड का चलन बढ़ रहा है, वहीं बीकानेर की यह परंपरा लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का काम कर रही है.

नई पीढ़ी भी इस परंपरा को सीख रही है और आगे बढ़ा रही है. साल में सिर्फ दो दिन बनने वाला यह खिचड़ा न केवल एक व्यंजन है, बल्कि बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक जीवनशैली का प्रतीक भी है. यह खिचड़ा सामान्य खिचड़ी से बिल्कुल अलग होता है. इसे गेहूं, चने की दाल, बाजरा और कभी-कभी जौ जैसे अनाजों के मिश्रण से तैयार किया जाता है. कई परिवारों में इसे सात प्रकार के धानों को मिलाकर भी बनाया जाता है, जिससे इसका पोषण स्तर और बढ़ जाता है. धीमी आंच पर कई घंटों तक पकने के कारण इसका स्वाद बेहद खास और लाजवाब हो जाता है.

1 से 1.5 घंटे में पककर तैयार होता है खिचड़ा

इस पारंपरिक व्यंजन की तैयारी भी अपने आप में एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है. महिलाएं आज भी पुराने तरीके से ओखली (हनुमानदस्ता) में बाजरे को कूटकर उसका छिलका अलग करती हैं. इस प्रक्रिया में करीब 20 से 30 मिनट का समय लगता है. यदि बाजरा पहले से कुटा हुआ हो, तो उसे 15-20 मिनट तक भिगोया जाता है. इसके बाद कुटे हुए बाजरे को साबुत मूंग की दाल के साथ हांडी या कुकर में डालकर धीमी आंच पर करीब 1 से 1.5 घंटे तक पकाया जाता है, ताकि सभी सामग्री अच्छी तरह गल जाए और स्वाद में एकरूपता आ सके.

राव बीका जी ने की थी परंपरा की शुरूआत

स्थानीय जानकार कृष्ण चंद पुरोहित ने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत बीकानेर के संस्थापक राव बीका जी के समय से मानी जाती है. उस दौर में पानी की भारी कमी और शुष्क जलवायु को देखते हुए यहां उपलब्ध अनाजों से ऐसा व्यंजन तैयार किया गया, जो पौष्टिक भी हो और लंबे समय तक ऊर्जा भी दे सके. यही कारण है कि यह खिचड़ा न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है. खिचड़े की एक खास पहचान इसमें डाला जाने वाला घी है. इसमें भरपूर मात्रा में घी मिलाया जाता है, जिससे इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है. कई लोग इसे बड़ी की सब्जी के साथ खाना पसंद करते हैं, जो इसके स्वाद को और भी खास बना देती है.

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deep ranjan

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से News18 हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें



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