नई दिल्ली. पौराणिक या ऐतिहासिक थीम पर बनी फिल्मों का रिव्यू करना हमेशा से दोधारी तलवार जैसा रहा है. ये ऐसी कहानियां नहीं हैं, जिन्हें आप बस स्क्रीन पर देखकर भूल जाएं. ये कहानियां दर्शकों की गहरी आस्था से जुड़ी होती हैं. आप कृष्ण की कहानी सिर्फ ‘देखते’ नहीं हैं, बल्कि आप इसे सुनते हुए भी बड़े होते हैं. यही वजह है कि ‘कृष्णावतारम पार्ट 1: द हार्ट (हृदयम)’ जैसी फिल्म का बिना किसी भेदभाव के एनालिसिस करना एक मुश्किल काम है. भारतीय दर्शकों के तौर पर, हमारी अंदर की भक्ति अक्सर हमारी लॉजिकल सोच पर हावी हो जाती है, लेकिन आखिरकार एक फिल्म को सिनेमा के स्टैंडर्ड पर खरा उतरना होता है. डायरेक्टर हार्दिक गज्जर की मास्टरपीस टेक्नीक और भक्ति का ऐसा अनोखा मेल है कि यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या हम सच में द्वारका या वृंदावन की गलियों में आ गए हैं.
कहानी
‘कृष्णावतारम- पार्ट 1: द हार्ट’ की कहानी को किसी इंट्रोडक्शन की जरूरत नहीं है, लेकिन इसका प्रेजेंटेशन इसे सबसे अलग बनाता है. यह फिल्म भगवान कृष्ण की जिंदगी को दिखाती है, जहां ‘दिल’ बसता है. यह हिस्सा मुख्य रूप से कृष्ण के इमोशनल रिश्तों पर फोकस करता है. फिल्म में राधा के लिए कृष्ण का पवित्र और निस्वार्थ प्यार दिखाया गया है, जो समय और दुनिया की सीमाओं से परे है. इस बीच, रुक्मिणी और सत्यभामा के साथ उनके शादीशुदा रिश्ते और एक पति के तौर पर उनकी जिम्मेदारियों को बहुत ही इंसानी, लेकिन दिव्य नजरिए से दिखाया गया है. कहानी सिर्फ घटनाओं को नहीं दिखाती बल्कि कृष्ण के डायलॉग्स के जरिए जिंदगी की फिलॉसफी को समझाती है. एक राजा के तौर पर उनकी जिम्मेदारियां, एक दोस्त के तौर पर उनका गाइडेंस और एक प्रेमी के तौर पर उनका जुदाई का दर्द… इन सभी को हार्दिक गज्जर ने खूबसूरती से बुना है. फिल्म का फ्लो इतना स्मूथ है कि आप एक सीन से दूसरे सीन में बहते चले जाते हैं. कहानी कभी भारी नहीं लगती, क्योंकि यह इमोशन पर आधारित है.
एक्टिंग
एक माइथोलॉजिकल फिल्म की सफलता पूरी तरह से उसकी कास्टिंग पर निर्भर करती है. अगर ऑडियंस एक्टर में भगवान की छवि नहीं देखती, तो फिल्म अपना असर खो देती है. यहां ‘कृष्णावतारम’ आसानी से जीत जाती है. कृष्ण के रोल में सिद्धार्थ गुप्ता ने किरदार को जिया है. उनके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान, आंखों में दया और उनकी चाल में शांति दर्शकों को लुभाती है. उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे सदियों से हमारे मन में बसी कृष्ण की छवि फिर से जिंदा हो गई है. सुष्मिता भट्ट की खूबसूरती और इमोशनल परफॉर्मेंस ने मां राधा के रोल को और बेहतर बना दिया है. उनके एक्सप्रेशन और कृष्ण के प्रति भक्ति स्क्रीन पर एक पवित्र एनर्जी पैदा करती है. वहीं, गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की पोती संस्कृति जयना ने सत्यभामा के रोल में बहुत अच्छा काम किया है. सत्यभामा की चमक, उनका गर्व और कृष्ण के प्रति उनका पजेसिवनेस… इन सभी बारीकियों को अच्छे से दिखाया गया है. रुक्मिणी के रोल में निवाशिनी की नरमी और गरिमा फिल्म को बैलेंस देती है. उनकी परफॉर्मेंस शांत लेकिन गहरी है. इसके अलावा, बाकी कलाकार भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय करते हैं, जिससे पूरी फिल्म एक जीवंत कोलाज जैसी लगती है.
डायरेक्शन
डायरेक्टर हार्दिक गज्जर ने साबित कर दिया है कि वह सिर्फ कहानियां नहीं सुनाते, बल्कि दुनिया बनाते हैं. उन्होंने ‘कृष्णावतारम’ को सिर्फ एक धार्मिक कहानी तक सीमित नहीं रखा. फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी है. हार्दिक ने फिल्म को ओवर-ड्रामैटिक या लाउड होने से बचाया है. जहां आजकल पौराणिक फिल्मों में अक्सर बहुत ज्यादा शोर और हिंसा होती है, वहीं हार्दिक ने इसे ‘नरमी’ के साथ पेश किया है. उन्होंने पुरानी कहानी को मॉडर्न सिनेमाई भाषा में इस तरह से पेश किया है कि आज की युवा पीढ़ी भी इससे जुड़ सकती है.
सिनेमैटोग्राफी
फिल्म के टेक्निकल पहलू इसे इंटरनेशनल लेवल पर मशहूर बनाते हैं. वृंदावन की हरी-भरी हरियाली, मथुरा की शान और द्वारका के सुनहरे महल, सेट्स और VFX का ऐसा तालमेल भारतीय सिनेमा में बहुत कम देखने को मिलता है. हर फ्रेम एक पेंटिंग जैसा लगता है. फिल्म का टेक्सचर चमकदार और स्मूथ है. कलर पैलेट आंखों को सुकून देने वाला है. मोर के पंख के पीले रंग और नीले रंग का मेल एक आध्यात्मिक माहौल बनाता है.
म्यूजिक
म्यूजिक इस फिल्म की जान है. गानों और बैकग्राउंड स्कोर में भक्ति और रोमांस का मेल फिल्म के इमोशंस को दोगुना कर देता है. म्यूजिक में दर्शकों को ध्यान की हालत में ले जाने की काबिलियत है.
कमियां
कोई भी आर्टवर्क पूरी तरह से बेदाग नहीं है. ‘कृष्णावतारम’ में भी कुछ छोटी-मोटी बातें हैं जिन्हें बेहतर किया जा सकता था. फिल्म की एडिटिंग कुछ जगहों पर थोड़ी धीमी लग सकती है, खासकर उन दर्शकों के लिए जो तेज-तर्रार एक्शन फिल्में पसंद करते हैं, क्योंकि यह पार्ट 1 है, इसलिए फिल्म कई सवालों के जवाब नहीं देती, जिससे कुछ दर्शक क्लाइमेक्स से थोड़ा नाखुश हो सकते हैं. हालांकि, यह अगले पार्ट के लिए एक्साइटमेंट बढ़ाने का भी एक तरीका है.
अंतिम फैसला
‘कृष्णावतारम पार्ट 1: द हार्ट’ सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि एक ऐसा अनुभव है जिसे महसूस किया जा सकता है. यह हमें याद दिलाती है कि टेक्नोलॉजी कितनी भी बदल जाए, कृष्ण से हमारा कनेक्शन कभी नहीं बदल सकता. यह फिल्म उन सभी के लिए है जो सिनेमा में शांति, प्यार और दिव्यता चाहते हैं. यह परिवार के साथ देखने लायक एक मास्टरपीस है. हार्दिक गज्जर और उनकी टीम ने एक ऐसी फिल्म बनाई है जो दर्शकों के दिलों में लंबे समय तक रहेगी. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.